सोमवार, 13 अगस्त 2018

द्विपदियाँ

गर्व वह पानी है,
जो बहल जानी है।
वदन जो रूखा है,
लो, ये रुखानी है।
सजी राजनय युवा,
देश जरा आनी है।
खेत बँटा मेंड़ जो,
आँगन कहानी है।
बोतल के बन्ध अब,
सागर है पानी है।
लटक रही तार पर,
सबकी जवानी है।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

जवनिकायें असित

जवनिकायें असित तनने लगी हैं,
टोपियाँ जाली चुभने लगी हैं।
पड़ी जान सासत में देखो हमारी,
कसाइनें सभत्तर कहने लगी हैं।
उपज की मारी खेतियाँ तुम्हारी,
बस करो बस करो रोने लगी हैं।
जमजम पानी तसबीह जुबानी,
अरे राम, हरे राम जपने लगी हैं।
नीर जिनकी कहानी पत्थर की मारी
कुटनियाँ सयानी बनने लगी हैं!

रविवार, 1 अप्रैल 2018

... अन्तमेली

न जा मेरी मुस्कानों पर,
रूदन रोधी अभिनय हैं!
रक्त का जिनके पता नहीं,
वे बने शुद्धि के परिचय हैं!
इतिहासों में नाम नहीं
मुझ पर करते संशय हैं!
पुरखे जिनके वीर्यपात, 
वे ब्रह्मचर्य के दुर्जय हैं!
कुल्हाड़े जिनके निर्दय हैं,
लगते उनको सब हैहय हैं!

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

गान्धारी का अलिखा शाप



आज उपस्थित हूँ मैं गांधारी 
सुनाने को वह अनलिखा शाप 
जो रह गया लक्ष के अधूरे से,
जो रह गया सूतों के अनुष्टुभ से।

"हे कृष्ण, सुनो! 

मैं देती हूँ अमरत्व
अश्वत्थामा को
तुम्हारे भावी अभिशाप से।
न जीता कोई अन्य इस जय में
भारत में, महाभारत में,
केवल एक विजेता - अश्वत्थामा
केवल एक पराजित - कृष्ण तुम।
भटकेगा वह तीन हजार वर्ष
मस्तक व्रण से पीव बहाता
तुम ईश्वर, कैसे हो सकता
व्यर्थ क्रोध तुम्हारा?
किंतु
तीन हजारवें के पश्चात
पहले विषुव में उसका घाव
भर जायेगा
समा जायेगा
वह नर नर
भावी में, आगामी में
कवियों के नवछंदों में -
अमर।
छीन तुम्हारे सुदर्शन को
वे बाँसुरी पकड़ायेंगे
भक्तिनें नाचेंगी धुन पर
भक्त कीर्तन गायेंगे।
सुनो कृष्ण हे!
इतना ही बस न होगा
तुम होगे गोपीरमण
पूनम की सब रातों में।
मेरा अश्वत्थामा
होगा सप्तर्षि एक
युग युग जीता सौगातों में।
होगी भविष्य की विवशता
ऋषि या नायक -
लोग उसे ही बतायेंगे।
तुम होगे केवल रासगीत भर -
राधारमण हरि गोविंद जय जय!"

बुधवार, 20 सितंबर 2017

क्षत्रिय मैं

पढ़ते हुये झुरझुरी होती है?
कोमलता कुम्हलाने लगती है??
...
सोचो कि लिखते हुये मैंने,
तोड़ी होंगी कितनी बेड़ियाँ
चढ़े होंगे कितने साहस सोपान
उस बिंदु तक जिसके आगे
आत्माहुति होती है कि जीना
यही है मित्र! न पार करता कोई
विश्वामित्र जो सिंधु कोई मधुच्छंद
रथों की दुर्धर्ष गति जलराशि से
रुकती, डूबते अश्व थल गुंजाल में
स्फीत वक्ष पेशियाँ वल्गाम स्नायु
तंतु तने कि मैंने रचे जीवनसूत्र
नये नवोन्मेष का रथी सारथी मैं
मैं हूँ महाक्षत्रिय जिसके रक्त में
जेजाकभुक्ति बलि शृंगार वृष
वासना जिसकी करती बातें
खिलखिलाती नदियों के तीर से
भेदती जिसकी दृष्टि क्षितिज को
पार कर उतार लाती संझाओं में
संझा भाखा सविता शिवनाथ
मैं भरत हूँ अग्नि सूर्य वरुण मित्र
सोम मैं आहुति मेरी पीते देव दे
पितरों को चषक नवसंस्कार को
तकती है भूमा मेरी दीठ को भेद
समुद्र के अतल तल भण्डार से
ला रत्न मैं मढ़ता हूँ मेदिनी कि
घूमें मेरे अश्व लिये मेध मैध्य देह
मेधा रचे नये आवर्त चक्र ऋत
बंध को विस्तार को निर्माण को
सोचो कि कितने ध्वंस होंगे पड़े
एक इस अस्तित्त्व में जानो कि
निर्भय नवोन्मेष का चक्रवर्ती
मैं क्षत्रिय अप्रतिहत रुद्र की 
निचोड़ जटायें उतार लाता जो
गङ्गा पृथ्वी करने को उर्वरा
रोता नहीं भस्म को देख जो
तप्त कर सान चढ़ता है स्वयं
हिम शीतल मृत्यु की गोद में
सोचो कि लिखते हुये मैंने,
तोड़ी होंगी कितनी बेड़ियाँ
चढ़े होंगे कितने साहस सोपान
उस बिंदु तक जिसके आगे
आत्माहुति ही होती है जीना।