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मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

कैसे?


मैल भरे मेरे चैल तुम तक छैल आऊँ कैसे? 
राग विराग न मधु पराग उस शैल जाऊँ कैसे? 
शुचि गहन अमा अन्धेरा गर्भगृह का देव पर, 
दीप जले ताख राख से हाथ बचाऊँ कैसे? 
तुम्हारी पगधूलि ली भाल कि तुम ऊँचे उठो, 
तुम्हीं दो शाप तो कहो किसी को बताऊँ कैसे? 
अधीर ओठों के अनल आँखों की बड़वागि तक, 
भाल चन्दन पिघले शङ्ख चुम्बन चढ़ाऊँ कैसे? 
स्फटिक शिलायें जड़ी हैं तुम्हारे घर कुट्टिम पर, 
मैल सने बिवाई भरे पाँव ले कर आऊँ कैसे?

रविवार, 16 दिसंबर 2018

कोई

महरूम आफताब से है दयार कोई, 
तारीकी में ढूँढ़ता कूचा-ए-यार कोई !
मजा लिया बहुत दोस्ती के बोसे में, 
चन्द दिन दुश्मनी रहे गुजार कोई। 
खुश है पतझड़ में बहेलिया बहुत, 
जाल उसकी फँसी है बहार कोई। 
नशेड़ी आँखें संग बिखरी जुल्फों के,
बुलावा भेजो जो दे अब सँवार कोई।
खामोशी सुकूँ नहीं न अश्फाक है, 
थकी समा में भटकती पुकार कोई।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

जवनिकायें असित

जवनिकायें असित तनने लगी हैं,
टोपियाँ जाली चुभने लगी हैं।
पड़ी जान सासत में देखो हमारी,
कसाइनें सभत्तर कहने लगी हैं।
उपज की मारी खेतियाँ तुम्हारी,
बस करो बस करो रोने लगी हैं।
जमजम पानी तसबीह जुबानी,
अरे राम, हरे राम जपने लगी हैं।
नीर जिनकी कहानी पत्थर की मारी
कुटनियाँ सयानी बनने लगी हैं!

बुधवार, 13 जून 2012

उठाया सलीब जो शैतानी मसीह का...

उठाया सलीब जो शैतानी मसीह का वो काँखने लगे
पहन माथे ताज काँटों का मेरा मर्सिया बाँचने लगे। 

जाहिर थे सुर संसार मेरे आँख नीचे गीत पन्ने थे 
पहली तान पर हुये दीवाने कुछ नंगे नाचने लगे। 

दिल में रहते थे पता न था कि थे देह समाये भी 
पुकार मेरी थी जोशीली गला खराब बताने लगे। 

हिम्मत की जो उतरूँ हजार लहरें परखने के बाद
दास्तानें डूबती कश्तियों की सबको सुनाने लगे। 

ठीक होता नहीं, है पाप अधम समुन्दर पार करना
तूफान तो थे ही नहीं जमीं पर जलजले उठाने लगे। 

पलट कर कह न दूँ कि ठीक नहीं वार कमर नीचे 
आह भरते छ्ल कहते जाँघ सलामत दिखलाने लगे। 

क्या करना ऐसे मकान का जिसकी नींव पानी हो
घर ढूँढ़ने निकला जवान बूढ़े सरहदें दिखाने लगे।   

शनिवार, 14 मई 2011

शिकायत




रोना नहीं आता उन्हें आब-ए-चश्म देख
हुज़ूर को है शिकायत आँखें सलामत क्यों हैं। 

शब्दार्थ : आब-ए-चश्म - आँसू
'हुज़ूर' वर्तनी शोधन आभार - वाणी शर्मा   

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

चन्द पंक्तियाँ

प्रीत की रंगत मेंहदी के निखार में नहीं

उमंग देखो, जिसके कारण लगाई जाती है।

हैं लब चुप और वो भीतर घुमड़ते रहते हैं

नाकाफी सादे हर्फ हैं, बेवजह सजाई पाती है।

हरदम तुम्हें वजहें मिलें कोई जरूरी नहीं

ढूँढ़ते जिन्हें दरबदर, ग़ैरों के दर पाई जाती है।

रोज बाँचते हैं अफसाने मन के शफेखाने में

कहें कभी जो, हकीक-ए-मश्वरा निभाई जाती है।    

  

 

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

नहीं होती

यूँ बेतहाशा भागने से कवायद नहीं होती 
रोज घूँट घूँट पीने से तरावट नहीं होती।

चुप रहते जब कहते हो क्या खूब कहते हो 
लब हिलते हैं, आवाज सी रवायत नहीं होती।

ज़ुदा हुआ ही क्यों कमबख्त हमारा इश्क़ 
आह भरते हैं हम और शिकायत नहीं होती।

रीझते हो रूठने पर, मनाना भूल जाते हो 
यूँ मान जाते हम तो ये अदावत नहीं होती।

अदावत ऐसी कि बस तेरा नाम लिए जाते हैं 
दुनिया में ऐसे इश्क पर कहावत नहीं होती।  

रविवार, 5 सितंबर 2010

लाइट ले यार!

ये कैसा इश्क है तेरा दिलवर?
जहाँ छूते हो वहीं दुखता है। 

दूसरा वर्जन: 

ये कैसा इश्क है तेरा दिलवर?
वहीं छूते हो जहाँ दुखता है।


सोमवार, 28 जून 2010

न दो

घिर आई बदलियाँ कोई नाम न दो 
स्याह शाम दिये को इलज़ाम न दो


तमाम शहर रोशन गलियों में आब
बेनूर से चेहरे कोई पहचान न दो


ठंडक से परेशाँ घर घर की गर्मी    
बिस्तर बेसलवट वस्ल नाम न दो


बच्चों की रवायत जो खेले खामोश 
ग़ुम खिलखिल को कोई पयाम न दो  

है तासीर इनकी उलूली जुलूली
मेरे गीतों को बहरों की तान न दो

शुक्रवार, 25 जून 2010

फुटकर

यकीं कैसे करूँ होठों पर 
अटकी हैं आँखें आँखों पर।


फूटते हैं अरमाँ-ए-इश्क 
ब्याह में छूटते पटाखों पर।


उकूबत में हर्फ तड़पते रहे 
रख दिए खत जो ताखों पर। 


चटकते चटकारे तन्दूर घेरे 
कोई मासूम है सलाखों पर। 


चमन में क़ायम कोयल कूक
कौवों के घोसले शाखों पर। 

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर

जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।

फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।

बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।

ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।

गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।

रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।

आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।

साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।

सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।

पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।