सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।
फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।
बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।
ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।
गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।
रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।
आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।
साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।
सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।
पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।
खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।
पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।
खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।

