सान्द्र घोल।
तुमने डाल दी
एक स्याही की टिकिया
धीरे से।
रंग की उठान
धीरे धीरे
ले रही आकार।जैसे समिधा
निर्धूम प्रज्वलित,
समय विलम्बित
बँट गया फ्रेम दर फ्रेम।
..कि
आखिरी आहुति सी
खुल गई
अभिव्यक्ति एकदम से !
तुम्हारी कविताई
बना गई मुझे द्रष्टा
एक ऋचा की।
