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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

फेसबुक जोगिरा

प्रशांत प्रियदर्शी :
कवन देश का राजा अच्छा कवन देश की रानी
कवन देश का राजा अच्छा कवन देश की रानी
कवन देश का खाना अच्छा कवन देश का पानी
जोगिरा सा रा रा रा.. जोगिरा सा रा रा रा


उत्तर में मैं:अमरीका का राजा अच्छा, भारत की रानी 
अमरीका का राजा अच्छा, भारत की रानी
स्विस देश का खाना अच्छा, पीयो मिस्री पानी।
जोगिरा सा रा रा रा सा रा रा रा रा रा रा रा

जीय जीय रानी बहिना, घोटालों की नानी
घोटालों की नानी रानी, बनती बहुत सयानी
एक्के रंग मंत्री के साफा, देखलावें ईमानी।
जोगिरा सा रा रा रा सा रा रा रा रा रा रा रा

महँगू अब्बो महँगा दाखिल, तेल नहीं न घानी
तेल नहीं न घानी भैया, भड़भुजवा किसानी
गदबेरा में चिलम चढ़ावे, पीये ललका पानी।
जोगिरा सा रा रा रा सा रा रा रा रा रा रा रा

सोमवार, 1 मार्च 2010

आज रंग है !

रंग हुड़दंग
अनंग संग भंग है
आज रंग है।

राति नींद नहिं आइ गोरि
सपन साँवरे भर भर अँकवारि
नशाय नसाय दियो उमंग है
आज रंग है।

चहका मन चमक चम
चौताल ताल नाचे तन
साजन बुढ़ाय पर
जवान जबर देवर देख
धधका बदन मदन संग
मचा जोबन सरर जंग
हुइ चोली जो तंग है
आज रंग है।

बौराया आम ढींठ हुआ
बयार के झँकोर बहाने
घेर गया नेह गन्ध ।
पड़ोसी की साँस सूँघ
तीत नीम मीठ हुई
फगुआ का संग है!
आज रंग है।

जाने कितने बरस बीते
मितऊ से बात किए ।
चढ़ाय लियो भाँग आज
कह देंगे दिल के राज
खींच लाएँगे आँगन बार
मिट जाँयगे बिघन खार-
लगाना तंगी को तंग है
आज रंग है।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

फागुनी मुक्तक - का तुम पहिरी हमरो पैजामा ?

(1)
गए हाट गुलाल मोलन को
तोहें देखे, पुनि  देखे लाली तोहार
हाथ पकड़ तोहे खींच लाए
रह गयो मोल अमोलन ही।
पलखत देख जो रगड़े गाल -
तुम वैसे ही लाल
रगड़ाय के लाल
लजाय के लाल
तोरी तिहरी लाली देख निहाल
हम हो गए लाल
लाल लाल - 
बिन गुलाल के लाल।
(2)
काहे सखियन बीच मोहे बदनाम करो - 
हम नाहिं तोरे तोहरी अँगिया के बन्ध 
साँच कहो, बिन शरमाय कहो
देख के हमको जो ली उसाँस
अँगिया खुली सब बन्ध गयो -
आन मिलो कुंज गलिन 
भिनसारे सँकारे साँझ अन्हारे
कर देब पूरन तोरे मनवा के आस
हौं खुलिहें अँगिया खुलिहें
सब खुलिहें
जब दुइ मन खिलिहें
खुलिहें। 
(3)
मधु रात भली 
बड़ि बात चली
जो जागे सगरी रैन,  
रहे सोवत
बड़ी देर भई।  
देख सभी मुसकाय हँसें 
हड़बड़ जो दुआरे गए - 
आरसि दिखाय चतुर हजाम 
वदन कजरा दमके सेनुरा।
ठठाय हँसे पुनि देख के सब
हम पहने रहे सलवार      
का तुम पहिरी हमरो पैजामा? 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

फागुन फागुन ......फागुन फागुन

(1) 
फागुन ने चूमा
धरती को -
होठ सलवट 
भरा रास रस। 
भिनसारे पवन 
पी गया चुपके से -
.. खुलने लगे
घरों के पिछ्ले द्वार । 
(2) 
फागुन की सिहरन 
छ्न्दबद्ध कर दूँ !
कैसे ?
क्षीण कटि - 
गढ़न जो लचकी ..
कलम रुक गई।
(3) 
तूलिका उठाई - 
कागद कोरे
पूनम फेर दूँ।   
अंगुलियाँ घूमीं 
उतरी सद्यस्नाता -
बेबस फागुन के आगे। 
(4) 
फागुन उसाँस भरा 
तुम्हारी गोलाइयों ने -
मैं दंग देखता रहा
और 
मेरी नागरी कोहना गई ।
लिखूँगा कुछ दिन
अब बस रोमन में -