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सोमवार, 21 नवंबर 2016

अकथ कहानी देह की

देह की।
अकथ कहानी
नेह की॥
तप्त श्वास 
भुजवलय
तुम
शनैश्चर
हम
मन्द लय
शीत हास।
जीवन एक
लग गई ढइया!
ज्योतिष रीत गया।
सीवन एक
रह गई अंगिया
गोचर बीत गया॥
देह की।
अकथ कहानी
नेह की॥

सोमवार, 7 नवंबर 2016

प्रेम करोगी?

प्रेम अंततः टूटना है आँजुरी भर पाँखुरी, भींचना है, कि रोयें, टूटे पुहुप, सुबुक और जग सुगंधित हो। कहो! प्रेम करोगी? (होना, प्रेम नहीं, बस आपा खोना है)

गुरुवार, 12 मार्च 2015

तुम जो नहीं

ढूँढ़ता हूँ कैमरे अंतर्जाल
जो उतार सकें निखार के साथ
मेरे चेहरे की हर रेखा हर भाव
उतार चढ़ाव झुर्रियाँ खिंचाव
दीप्त प्रकाश।

युग बीते मिले अन्धकार
तुम्हारी अंगुलियाँ अद्भुत चित्रकार
गढ़ती थीं निज मनोलोक
मेरे विस्तार।
 
तुम जो नहीं
ढूँढ़ता हूँ ऐसे निर्जीव
कर सकें जो मुझे सजीव
यह नैतिक अर्जित ज्ञान प्रकाश
हम तो थे अनैतिक अन्हार!      

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

अगली बार होठ

पिघलन श्लथ देह की
उमड़ी निथरी
निकसी आँखों से
उत्सुक
छू लिया लावा मोम
अँगुरी के पोर आज भी जमी है -
मेरी देह
आसगर्भा है
अगली बार होठ छूने हैं।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

जागरण

प्रार्थना के अर्घ्य सम
अलस मंत्र गीति लय
निशा जागरण आँजुरी भर
पीना चाहता हूँ।

प्रात नव स्निग्ध नम
रक्तिम नींद अधर पर
ले चुम्बन एक पलक भर
सोना चाहता हूँ।

न कहना -
जागना चाहता हूँ!

_______________


गिरिजेश राव 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

और वे मंत्र हो गये!

समझता हूँ स्पर्श तुम्हारे नयनों के 
लालिमा फूटती भी है गह्वर में 
उलझा निज विधा सायास 
रोकता हूँ रुख तक आने से 
आ गयी जो 
नयन वही होंगे तुम्हारे 
किंतु स्पर्श खो जायेंगे 
तुम्हारा यूँ निहारना मुझे 
रुचता है, मोहता है 
मैं खोना नहीं चाहता 
रोकता हूँ लालिमा निज की इसलिये।
जाने कितने क्षण अक्षण हुये 
ऐसे में कुछ किया नहीं मैंने 
बस अपने गीतों को 
तुम्हारा नाम दिया 
और वे मंत्र हो गये!
_______________

~ गिरिजेश राव 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

हुई लाल!



साँझ को 
निशा निमंत्रण 


सूरज ने फेरा हाथ 
गोरी गंगा लाज 

हुई लाल! 

रविवार, 10 नवंबर 2013

आवश्यक है रचना

आवश्यक है रचना एक शृंगार कविता 
तुम्हारी कमर सीधी करती भंगिमा पर
जैसे आवश्यक है तुम्हारा मुस्कुराना 
ऐनक काँच जमी मेरी अंगुलियों पर 
ये दवा हैं उस रोग की जिसे आयु कहते हैं 
आयु देह की नहीं, आयु मन की नहीं 
आयु प्रेम की जिसकी हर साँस पहरे हैं - 
वाद के, कृत्रिम उपचार के, कथित यथार्थ के
आवश्यक है झूठ होना, दुखना, दुखाना
इस युग तो सही सुख की बातें सभी करते हैं!

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

साखी

रात नम तुम्हारे होठों की तरह
लाज की बात है आँखें मूँदनी हैं
मुझे चूमनी हैं साँसें अंधकार में
ऊष्ण उड़ेगी निविड़ में प्रीत सन
प्रात कसे जग हमें जो शुचिता पर
साखी होंगी बूँदें टँगी दूब पर!
___________
- गिरिजेश राव 201310302254 

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

सूर्या सोम

भोर दिखा
भर निशा जागा सोम
मुस्कुराता
~~~~~~

2013-10-25-1090 - Copy
अवगुंठन जगी साँवरी सूर्या साथ
चमक रही माँग रोली नवविवाह
प्रात पूर्ण उद्योग
~~~~~~~~~~~

2013-10-25-1093
प्रस्फुर उल्लास बदन वदन
उमंग साँवरी देह हिरण्य द्युति
संगति साजन उपहार कंचन कंचन
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

द्वितीयोनास्ति प्रेम समर्पण
सोम दृग चन्द्रिकामृत अंग अंग
सूर्या गौर तेजस्विनी निज हिरण्य समो     

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

उसकी श्रुतियाँ

उसने कहा -
तुम अभिशप्त हो
भ्रष्ट आत्मा हो

उस क्षण मुक्त हुआ
उसके रँगे काषाय को ओढ़
यायावर निकल पड़ा

प्रेम यदि मिलना मिलाना है
तो उसका कहना अभिशाप नहीं

प्रेम यदि एकांत है
तो उसका कहना भ्रष्टाचरण नहीं

यही सोच मैं द्वैत हुआ
उसे क्षमा किया

और वह पुन: मिली
कहा - तुम्हें सुनना है

ये जो शब्द हैं
मेरे मौन हैं

उसकी श्रुतियाँ हैं   

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

शरद की प्रात

शरद की प्रात शीतल ओसमयी
चूमा है जगते ही बासी मुँह
धरा ने निठुराये आकाश को

ठिठुरन है या है तन में झुरझुरी
प्रेम बैठता पगता भीनता सा
उड़ेलता कोई माटी के नवघट इक्षुरस

मिचमिची आँखें बदनपीर राम राम
टूटती अँगड़ाइयाँ सन अंग अंग
लिप्त हैं दोनों आदिम आराधना में   

सोमवार, 2 सितंबर 2013

सुन मीता मेरे!

सुन मीता मेरे
चुक जाय जब मसि मेरी लेखनी में
मेरे बीते अक्षर पढ़ना।
अनमना हूँ पर हूँ तुम्हारे साथ सर्वदा
तुम मेरी कहानी कहना।

तुम्हारा कहना
खुलना होता है तिरस्करिणी का
मुझे दिखता है वह जिसे तुम ईश्वर कहते हो
खिलते हैं उन क्षण अनकहे हरित से कुछ
मैं होता हूँ स्तब्ध

चुप रहूँ तो मुझे निज शब्द सुनना
मीता मेरे!
वही है वह प्रार्थना जो तुम हो मेरे लिये


गुरुवार, 22 अगस्त 2013

मृत्यु का जन्म

...और तब उसने स्वयं को काट कर आधा किया
उसे अलग किया जिसे वह प्रेम कर सके
उस दिन मृत्यु का जन्म हुआ।

बुधवार, 8 अगस्त 2012

सुरत हँसी, विरत हँसी

उमसा उमसा 
समय सूखी नदी सा
रहे केवल तट मना रे
दिन सहमा सहमा। 
दो किनारे 
सीमाहीन शुष्क 
जीवन रेत मचल उठी 
फिसल न जाय! 
आतप श्वास लिप्त तप्त 
रेत धधक उठी 
मकई दानों की लड़ी झड़ी 
तुम्हारी सुरत हँसी।
भूख सोंधी सजल तृप्त 
पिघले तट सरि के
नदिया बह चली 
तुम्हारी विरत हँसी। 
***********

चित्राभार: http://www.flickriver.com/photos/tags/noordhoekbeach/interesting/

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

आज की रात तुम्हें फिर पाना चाहता हूँ।

होठों की नमी के पीछे
दहकती पास प्यास
रेख रेख देख सकता हूँ
छू नहीं सकता - होठ सूखते हैं।

इतने निकट होना कि
साँसें दूर धकेलने लगें
और आँखें जीभ को सोख लें
कह नहीं सकता - होठ फटते हैं।

हवाओं को सहलाता हूँ
अंगुलियों से सुलझाता हूँ
चमकते चन्द रजत गुच्छे
बह नहीं सकता - आँसू रुकते हैं।

बुनता हूँ धागे जो अदृश्य हैं
कि पहना दूँ दिगम्बर तन को
जलती चाँदनी जलन से रूप पर
सह नहीं सकता - भाव बिंधते हैं।

न, वहीं रहो, दूरियाँ सुन्दर हैं
आज की रात बस सुन्दर है
निशा सहमेगी, भटकेगी यामिनी,
पर्याय हो रजनी करेगी राहजनी
कोई चिंता नहीं, दुख नहीं, सुख नहीं
लुटने लुटाने का भय नहीं
इतनी उठान कि उड़ना चाहता हूँ
इतनी थकान कि मरना चाहता हूँ।
आज की रात मैं बच्चे सा सोना चाहता हूँ

कुछ नहीं, खोया कभी नहीं
आज की रात तुम्हें फिर पाना चाहता हूँ। 

रविवार, 17 जुलाई 2011

तुम्हारे बिना अब तो और नासमझ हूँ।

परिवारी नैन झरोखे
करते रह गये निगरानी।

किंवाड़ चौखट झरोखे
झाँकते दो नैन झरोखे 
प्रेम छ्ल उतरा 
अधर दबा दाँतों से। 
अंगुलियाँ हुईं मेरी घायल
किंवाड़ चौखट बीच पिस,
और चीख निकली तुम्हारी।

होती रही निगरानी
बात करती रही सयानी 
लेकर मेरा कर अपने कर 
होठों की फूँक में
लेकर मेरी सिसकारी
बच्चे हो क्या? 
वहाँ ऐसे हाथ रखते हैं भला? 
बहुत पिरा रही है? 
बुद्धू! कुछ नहीं समझते।
... 
...
हाँ, मुझे पीर की समझ नहीं 
तुम्हारे बिना अब तो और नासमझ हूँ।           

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

मीत रचो गीत आज

मीत रचो गीत आज, देहों के सजे साज, छुअन अंग बदन काम, मीत रचो गीत आज। 
संयम न ध्यान याम, आदिम हैं राग साम, सहज शब्द नि:शब्द धाम, सूझे भला गीत गान? 
साँसो के तार धार, चुम्बन अधर बार बार, गन्ध मिलन दो विराम, मीत रचो गीत आज। 
.
.
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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

बस यूँ ही बुद्धू बने रहना

वंचना जग की प्रवृत्ति,
घोर अनास्था पैठ रही। 

सच का है कड़वा स्वाद, तड़का तराशें और परोसें 
झूठ गली का सोंधा माल, चटकारे ले सभी भकोसें। 
किंशुक फूले, फूले गुलमोहर, छतनार हुई गाछों की डालें 
चक्र सनातन घूमे अविरत, कौन घड़ी हम बन्धन बाँधें? 

श्लथ छ्न्द अनुशासन, गण अगणित, टूटें क्षण क्षण। 
रह रह समेटना, गिरना,रह रह उठना।

नहीं, तुम्हारा प्रिय नहीं पराजित।
ढूँढ़ता है इस मौसम 
होठों पर खिलते हरसिंगार 
सरल अंत:पुर शृंगार 
भाषित सुगन्ध सदाचार
प्रेमिल वाणी निश्छल 
मौन सामने साँसें प्रगल्भ -  
"ऐसे ही रहना बुद्धू! 
मर कर होते विलीन 
सब भूत लीन  
नश्वरता संहार 
अन्याय अत्याचार 
सब सही। 
सोचो तो 
तुम कहाँ पाते ठाँव 
जो मैं न होती?
सोचो तो 
कौन करता आराधन 
इस भोली अनुरागिनी का 
जो तुम न होते?"  
- क्या यह बस मुग्ध प्रलाप?- 
"नहीं, यह है विस्मृति 
जिसे तुम कहते स्मृति।
भूले जीवन श्वेत श्याम 
द्वन्द्व प्राण का पहला नाम। 
देखो! मैं बिखरी अब ओर 
देखो! तुम बिखरे सब ओर  
टूटे क्षण नहीं, मुझे समेटो 
हरसिंगार हैं हर पल झरते
कुचल गये जो, निज को समेटो।
क्या समझाना? 
अब तो मैं हुई बड़ी 
क्या समझना? 
अब तो तुम हुये बड़े?
विस्मृति ही सही 
बस यूँ ही स्मृति में लाते रहना।
स्मृति ही सही 
बस यूँ ही बुद्धू बने रहना।"

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

बेबहर नम लहर

न हिज़ाब पर यूँ अनख मेरे महबूब!
जतन से ओढ़ी है कि तेरी नज़र न लगे।
नज़र लग गई तो फिर उतरेगी नहीं 
लगी जो कभी वो कहाँ उतरी आज तक?
न कहो अब लगने लगाने को बचा कहाँ?  
हुई हैं खाली आँखें ढेर सा टपका कर। 
ये इश्कोमुहब्बत जैसे दिललगा सूरन 
लगे, न लगे और सवाद का पता ही नहीं। 
चलो धीरे, बुझती हैं आहट के झोंको से
हैं बत्तियाँ नाज़ुक तुम्हारी माशूक नहीं।
जो आँख फेरी है तो वैसे रह भी पाओगे?
ग़ुम सदा कान में और रुख पलट जायेगा। 
मेरी कुछ हरकतें जो हैं तुम्हें नापसन्द, 
सुना देना उन्हें सज़दे में, वो बुरा न मानेगा।