स्मरण दिवस प्रिये, निमंत्रण देह गन्ध
पहली बेला महकी।
वलय वृत्त गणित, सौन्दर्य सृष्टि अपार
केवल सन्तति हेतु ?
तुमने रचा संसार, मधु राग राग स्वर
आभा नृत्य अभिसार ।
अधर मार्दव चूम, दाड़िम दंत पखार
स्पर्श सुख सहसा सा।
रोम रोम रस धार, छाया विद्युत प्रवाह
कसा बसा आलिंगन।
टूटे बन्ध देह मुक्त, तड़प उठी बिजली
लयकारी सिसकी की।
साँसे ऊष्ण संघर्षण, दो एकाकी हुए एक
आहुति अर्घ्य संगति।
प्लवित मन सकार, नेह झील पूरन सी
सिद्धि हुई जीवन की।
पहली बेला महकी।
वलय वृत्त गणित, सौन्दर्य सृष्टि अपार
केवल सन्तति हेतु ?
तुमने रचा संसार, मधु राग राग स्वर
आभा नृत्य अभिसार ।
अधर मार्दव चूम, दाड़िम दंत पखार
स्पर्श सुख सहसा सा।
रोम रोम रस धार, छाया विद्युत प्रवाह
कसा बसा आलिंगन।
टूटे बन्ध देह मुक्त, तड़प उठी बिजली
लयकारी सिसकी की।
साँसे ऊष्ण संघर्षण, दो एकाकी हुए एक
आहुति अर्घ्य संगति।
प्लवित मन सकार, नेह झील पूरन सी
सिद्धि हुई जीवन की।