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गुरुवार, 24 मार्च 2011

कच्च, कच्च?...हाँ जी, सच्च सच्च।

बच्चे गये स्कूल 
और घर में रह गये 
मैं, तुम और 
छ: घड़ियों की कच्च...कच्च... 
घड़ियाँ तेज नहीं भागतीं 
चाहे जितनी घड़ियाँ लगा लो। 
समय की अपनी मर्यादा है।

इतने वर्षों में एक बदलाव हुआ है
चाभी वाली घड़ी डायनासोर हो गई  
लिहाजा एक सेकेंड में 
तीन बार की टिक टिक तेज रफ्तारी भी गई। 
अब डिजिटल का जमाना - 
एक बार में एक सेकेंड - कच्च!
नो टिक टिक भागमभाग। 
पर 
जिन्दगी भागमभाग 
तेज रफ्तार हो गई तीन गुनी। 

तो ऐसे कंफ्यूजन में 
जब कि तनहाई है 
और ऑफिस जाने में अभी टाइम है - 
क्यों न कुछ कच्च कच्च चुरा कर रख लें? 
इस खतरे को उठा कर भी 
कि दाल जल जायेगी
या दूध फफा जायेगा ... 

ये सजोई गई चोरियाँ 
बहुत काम आयेंगी 
तब जब बच्चे अपने अपने घर की 
कचकच ..उफ! .. कच्च कच्च में बीजी होंगे 
और डिजिटल घड़ियों में समय ठहर जायेगा।

बैटरी बदलने को भी किसी को बुलाना होगा 
वह जब तक नहीं आयेगा 
समय होगा हमारा ग़ुलाम। 
उस ठहरे दौर में चोरी की पोटली खोलेंगे 
तुम एक कच्च को लपक कर हँसना 
और मैं दूसरे को सहलाते 
आज की जली दाल याद करूँगा- 
दो बच्चों की ठिठोली।

इस चोरी में एक स्वार्थ भी है - 
जली कटी को बचाने का। 
पोटली के खिलवाड़ में 
जली कटी न कही जायेगी 
और न सुनी जायेगी। 
वह रह जायेगी 
हमारी रूहों में 
सुरक्षित। 
और हम 
इश्क़ के माइक्रोओवन में 
पकी खिचड़ी खा कर जीते जायेंगे - 
जलने का कोई डर नहीं। 

मैं जानता हूँ 
तुम हँसोगी और पूछोगी -  
रूह की जली कटी का क्या करेंगे?
उत्तर यह है प्रिये! 
कि 
मरने के बाद 
ईश्वर का करने को हिसाब 
ये जली कटी काम आयेंगी। 
वह लजायेगा 
और 
उन्हें ले कर रख लेगा अपने पास। 
अगले जन्म में 
यानि कि 
सात जन्मों के अगले चक्र में 
हमारी आत्मायें हल्की होंगी 
और अधिक स्वस्थ होंगी। 
अब यह न पूछ्ना 
कि 
अगर यह जन्म सातवाँ हुआ तो?      

देखो! दाल जलने की गन्ध भी आने लगी 
अब वैसे आँख झपकाना छोड़ो 
जब शुरू के दिनों में मैं करता था 
प्यार की बातें और तुम बस झप्प! झप्प!! 
कुछ कच्च कच्च सहेज लें - 
सच्च? 
हाँ जी, 
सच्च!

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

तुम्हारी लम्बी बीमारी

(1) 
तुम्हारी लम्बी बीमारी 
अरगनी पर टँगे सूखते सूखे कपड़ों सी।
नहीं हटा पाया उन्हें, भीगने भिगोने का डर है।

(2) 
कपड़ों में भीनी ओस
रोज उड़ जाती है गुनगुनी धूप में ही।
कोई ठौर नहीं, मेरे आँसू बस उमड़ते रहते हैं।   

(3) 
तुम पूछने लगी हो अब
रोटियाँ नमकीन क्यों लगती हैं?
क्या कहूँ? आँसू बस रसोई में बरसते हैं!
  

  

शुक्रवार, 21 मई 2010

कविता नहीं - प्रलय प्रतीति

बरसी थी चाँदनी
जिस दिन तुमने लिया था
मेरा - प्रथम चुम्बन।
बहुत बरसे मेह
टूट गए सारे मेड़
बह गईं फसलें
कोहराम मचा
घर घर गली गली
प्रलय की प्रतीति हुई।
बेफिकर हम मिले पुन:
भोर की चाँदनी में
मैंने छुआ था तुम्हें
पहली बार
(चुम्बन में तो तुमने छुआ था मुझे !)
पहली बार तुम लजायी थी
घटा घिर आई थी
उमड़ चली उमस
खुल गए द्वार द्वार
मचा शोर
चोर चोर
तुमने लुटाई थी
बरसों की थाती
मैंने नहीं चुराई थी।
 ...
इतने वर्षों के बाद
आज भी  आसमान में घटाएँ हैं
लेकिन कहीं कोई कोहराम नहीं
कहीं कोई शोर नहीं
जब कि पार्क में
बैठा है युगल
मुँह में मुँह जोड़े।
न होता उस दिन
अपराध बोध
तो आज हम अगल बगल खड़े
कर रहे होते विमर्श
तुम्हारी कमर के दर्द पर
मेरे घुटनों की सूजन पर ।
कहीं तुम भी किसी जगह
सोचती होगी यही
अब कोई मेघदूत नहीं
जो सन्देश लिए दिए जाँय।
अब उमर भी कहाँ रही ?
घर की छत न टपके
मरम्मत के लिए
राजगीर आया है
भीतर से फरमान आया है:
नीचे आओ
नज़र सेंकनी बन्द करो
कल तूफान आएगा
टीवी ने बताया है।
...
मैंने सारी उमर
प्रलय गीत गाया है
कैसे थे सुर उस दिन !
जब  प्रलय प्रतीति हुई थी?