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शुक्रवार, 21 मई 2010

कविता नहीं - प्रलय प्रतीति

बरसी थी चाँदनी
जिस दिन तुमने लिया था
मेरा - प्रथम चुम्बन।
बहुत बरसे मेह
टूट गए सारे मेड़
बह गईं फसलें
कोहराम मचा
घर घर गली गली
प्रलय की प्रतीति हुई।
बेफिकर हम मिले पुन:
भोर की चाँदनी में
मैंने छुआ था तुम्हें
पहली बार
(चुम्बन में तो तुमने छुआ था मुझे !)
पहली बार तुम लजायी थी
घटा घिर आई थी
उमड़ चली उमस
खुल गए द्वार द्वार
मचा शोर
चोर चोर
तुमने लुटाई थी
बरसों की थाती
मैंने नहीं चुराई थी।
 ...
इतने वर्षों के बाद
आज भी  आसमान में घटाएँ हैं
लेकिन कहीं कोई कोहराम नहीं
कहीं कोई शोर नहीं
जब कि पार्क में
बैठा है युगल
मुँह में मुँह जोड़े।
न होता उस दिन
अपराध बोध
तो आज हम अगल बगल खड़े
कर रहे होते विमर्श
तुम्हारी कमर के दर्द पर
मेरे घुटनों की सूजन पर ।
कहीं तुम भी किसी जगह
सोचती होगी यही
अब कोई मेघदूत नहीं
जो सन्देश लिए दिए जाँय।
अब उमर भी कहाँ रही ?
घर की छत न टपके
मरम्मत के लिए
राजगीर आया है
भीतर से फरमान आया है:
नीचे आओ
नज़र सेंकनी बन्द करो
कल तूफान आएगा
टीवी ने बताया है।
...
मैंने सारी उमर
प्रलय गीत गाया है
कैसे थे सुर उस दिन !
जब  प्रलय प्रतीति हुई थी?