आज आभासी संसार और वास्तविक वातावरण में टहलते हुए दो नए जन मिले। देखने से गुरु शिष्य लगते थे। विपरीत दिशाओं से आते हुए जब हम लोग पास हुए तो उनकी बातचीत के कुछ अंश कानों में पड़े। अच्छे लगे , सोचा आप सबको भी बता दूँ। उनके पीछे पीछे नहीं जा पाया। उनकी निजता का उल्लंघन होता। हालाँकि उनकी बातचीत में निज जैसा कुछ भी नहीं था फिर भी ...
"...बड़े शहरों की ज़िन्दगी अब 'सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यूँ है' की बिडम्बना से आगे वहाँ पहुँच चुकी है जहाँ जलन और तूफान स्वीकृत हो चले हैं। मन में सवाल तक नहीं उठते । एक अज़ीब तरह की झुँझलाहट है जो नकार नहीं पाती क्यों कि नकार के साथ ही विडम्बना और रोटी से जुड़ी समस्याएँ इतनी बड़ी दिखने लगती हैं कि सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है।
दोस्त हैं लेकिन सतर्क से। विमर्श के और समागम के विषय या बहाने परिवेश से बाहर वालों के लिए कौतुहलकारी नहीं भयकारी हैं। 'गोली मार भेजे में ..' का बेलौसपना भी नहीं, अजीब सी बँधी जिन्दगी है, सिमटी हुई सी, औपचारिक सी। कहने के लिए भी दोस्त गले नहीं लगते ...दिखावे तक की हैसियत आधुनिक(ता) पहनावे [लगता है सुनने में भूल हुई :)] सी हो गई है - यूज एण्ड थ्रो ...
ऐसे में कविता ? क्षमा करें आर्य ! 'भोग' दु:ख देता है। इस दु:ख से 'मुझसे पहली सी मुहब्बत ' जैसी नज़्में नहीं निकलतीं।"
"वत्स! तुम्हारी सोच सीमित है। दु:ख दु:ख ही होता है। उसमें प्रकार नहीं आकार होते हैं। उन आकारों को वाणी दो, काव्य स्वत: उतरेगा। क्रौञ्च वध शाश्वत है और अनुष्टप भी शाश्वत हैं।"