पड़ोसी को देख
उसी की तरह
अजनबी हो जाता हूँ मैं।
न कहता कुछ भी
दिल में सब रखता
दोस्तों को गले
अपने काम से काम
एक शहरी का फर्ज़
निभाता हूँ मैं।
डिनर के बाद
दो ह्विस्की के पैग
लगाता हूँ मैं।
फिर भी जाने क्यों
सोते सोते रातों में
यूँ ही जाग जाता हूँ मैं।
जाने कैसा है ये फर्ज़
न जानूँ फिर भी
निभाता हूँ मैं
यूँ ही जाग जाता हूँ मैं।