सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली
आ रही होली।
पुरा' बसन उतार दी
फुनगियाँ उगने लगीं
शोख हो गई, न भोली
धरा गा रही होली।
रस भरे अँग अंग अंगना
हरसाय सहला पवन सजना
भर भर उछाह उठन ओढ़ी
सजी धानी छींट चोली।
शहर गाँव चौरा' तिराहे
लोग बेशरम बाग बउराए
साजते लकड़ी की डोली
हो फाग आग युगनद्ध होली ।
जो दूसरों की हैं, कवितायें हैं। जो मेरी हैं, -वितायें हैं, '-' रिक्ति में 'स' लगे, 'क' लगे, कुछ और लगे या रिक्त ही रहे; चिन्ता नहीं। ... प्रवाह को शब्द भर दे देता हूँ।
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
आचारज जी
फाग पर्व शुरुआत यहाँ से है।
फिर इहाँ
फिर इहाँ।
और अब नीचे ताकिए।
आप भी योगदान कर सकते हैं इस संक्रामक रोग को फैलाने में ।
इंटरनेट पर भी बसंत में आम बौराना चाहिए। रंग है, हुड़दंग है।
__________________फागुन आइल आचारज जी
लागे पहेली सोझ बतियाँ आचारज जी
अरे, आचारज जी।
नेहिया ले फन्दा मदन बौराया
मदन बौराया मदन बौराया
तेल पोतलें देहियाँ आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी
आइल फागुन लखेरा आचारज जी।
बिछली दुअरवा लगन लग घूमे
लगन लग घूमे लगन लग घूमे
ताकें हमरी रसोइया आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।
मकुनी औ मेवा रोटी पकवलीं
चटनी पोत बिजना परोसलीं
बरजोरी से आए आचारज जी
अरे, आचारज जी।
चटकारा ले खाएँ आचारज जी
जो देखे कोई थूकें आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।
अरे आचारज जी।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
बसन तन पियर सजल हर छन
यह कविता देवेन्द्र जी के इस गीत को पढ़ने से उपजी है।
हमरा कउनो कुसूर नाहीं है।
इसमें किसी के लिए छिपा सन्देश भी है। आशा है समझ जाएँगें।
____________________________________________
बसन तन पियर
सजल हर छन
छन छ्न ...___________________________
सरलार्थ:
हमरा कउनो कुसूर नाहीं है।
इसमें किसी के लिए छिपा सन्देश भी है। आशा है समझ जाएँगें।
____________________________________________
बसन तन पियर
सजल हर छन।
हरख हरखन
टुटल बरत
नवरतन बरजन ।
मदन अगन मगन मन
हर मन सगुन धुन
गुन गुन ....
ह म श टुन टुन
खदकत अदहन धुन!
..अवगहन
सजल हर छन।
हरख हरखन
टुटल बरत
नवरतन बरजन ।
मदन अगन मगन मन
हर मन सगुन धुन
गुन गुन ....
ह म श टुन टुन
खदकत अदहन धुन!
..अवगहन
बसन तन पियर
सजल हर छन
छन छ्न ...
सरलार्थ:
बसन - वस्त्र, पति
पियर - पीला, प्रिय
सजल - नवरस से भरा, सजा हुआ
छ्न - क्षण, छन छन की ध्वनि
हरख - हर्ष
हरखन - प्रसन्नता
टुटल - टूट गया
बरत - व्रत
नवरतन - नवरात्र, नव-रति
बरजन - वर्जना
अगन - अग्नि
सगुन - शुभ आगम का संकेत
खदकत - खौलता हुआ
अदहन - चावल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया हुआ खौलता पानी
अवगहन - अवगाहन, कोई बात जानने या समझने के लिए उसके संबंध में की जानेवाली खोज, छान-बीन या मनन
पियर - पीला, प्रिय
सजल - नवरस से भरा, सजा हुआ
छ्न - क्षण, छन छन की ध्वनि
हरख - हर्ष
हरखन - प्रसन्नता
टुटल - टूट गया
बरत - व्रत
नवरतन - नवरात्र, नव-रति
बरजन - वर्जना
अगन - अग्नि
सगुन - शुभ आगम का संकेत
खदकत - खौलता हुआ
अदहन - चावल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया हुआ खौलता पानी
अवगहन - अवगाहन, कोई बात जानने या समझने के लिए उसके संबंध में की जानेवाली खोज, छान-बीन या मनन
शब्दचिह्न :
कविता,
गीत,
बसंत के स्वागत में
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर
जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।
फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।
बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।
ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।
गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।
रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।
आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।
साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।
फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।
बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।
ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।
गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।
रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।
आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।
साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।
सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।
पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।
खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।
पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।
खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।
शब्दचिह्न :
26 जनवरी,
कविता,
गणतंत्र दिवस,
गिरिजेश,
द्विपदी
रविवार, 24 जनवरी 2010
तुम्हारी कविताई
पारदर्शी पात्र
सान्द्र घोल।
तुमने डाल दी
एक स्याही की टिकिया
धीरे से।
रंग की उठान
धीरे धीरे
ले रही आकार।
जैसे समिधा
निर्धूम प्रज्वलित,
समय विलम्बित
बँट गया फ्रेम दर फ्रेम।
..कि
आखिरी आहुति सी
खुल गई
अभिव्यक्ति एकदम से !
तुम्हारी कविताई
बना गई मुझे द्रष्टा
एक ऋचा की।
सान्द्र घोल।
तुमने डाल दी
एक स्याही की टिकिया
धीरे से।
रंग की उठान
धीरे धीरे
ले रही आकार।जैसे समिधा
निर्धूम प्रज्वलित,
समय विलम्बित
बँट गया फ्रेम दर फ्रेम।
..कि
आखिरी आहुति सी
खुल गई
अभिव्यक्ति एकदम से !
तुम्हारी कविताई
बना गई मुझे द्रष्टा
एक ऋचा की।
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