बुधवार, 16 दिसंबर 2009

पुरानी डायरी से - 10: कल्पना के लिए

6 फरवरी 1994, समय:__________                                               कल्पना के लिए  


कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी - 
मैं रहूँ, मेरा शून्य हो और तुम रहो।
मोमबत्ती का अँधेरा हो/ उजाला हो
हम तुम बातें करें - शब्दहीन
तुम्हारे अधर मेरे अधरों से बोलें
मेरे अधर तुम्हारे अधरों से बोलें
शब्दहीन।
कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।


प्रात:काल में जब
सूर्य की किरणों से भयमुक्त
तुहिन बिन्दु सहलाते हों पत्तियों को ।
निशा जागरण के पलों से मुक्त होकर
मैं तुम्हें देखता रहूँ
अपलक
अविराम। 
कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।


दुपहर की चहल पहल में
किसी बाग के सनसनाते सन्नाटे में
मेरे श्वास नहा रहे हों 
तुम्हारी तप्त साँसों की शीतलता में
और
घुल रहे हों हमारे एकाकी क्षणों में
किसी अनसुने गीत के बोल।
कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।


संध्या के करियाते उजाले में जब
दीप जलायें या न जलायें
इस असमंजस में हो गृहिणी ।
उस समय हमारा मिलन  छलकता हो 
डूबते सूरज की लाली में।
हमारे बोल गूँजते हों चहचहाहट में।


कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।
मैं रहूँ मेरा शून्य हो और तुम रहो
कभी कभी मैं सोचता हूँ। 

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

डॉन के साए में कविता. .


घर के सामने पसरी तरई भर धूप 
निहाल रहती है - 
बैठते हैं एक वृद्ध उसकी छाँव में 
आज कल।
मैं सोचता हूँ -
कितनी उदास रही होगी 
अकेली उपेक्षित धूप अब के पहले तक !

कल मैंने सुना घर को 
सामने के पार्क से बतियाते
देखो, कौन आया है ! 
मैं समृद्ध हूँ 
अतिरिक्त 
आज कल मेरी दो साल पुरानी दीवारें
घेरे रहती हैं - पचहत्तर वर्षों की समय सम्पदा।


मैं द्रष्टा और अनुकरणशील हूँ 
मुझ डिक्टेटर पर छा गया है अनुशासन - 
डॉन आए हैं। 
पिताजी आए हैं, आज कल।


घर के घेरे का सीमित यंत्रवत सा दैनन्दिन 
प्राण धन पा उचक उछल दौड़ गया है - 
बाहर । 
मैं देख रहा हूँ
घर को घेरे हुए हैं
स्नेह की रश्मियाँ
जैसे माँ के आँचल में सोया शिशु 
धीमे धीमे मुस्कुरा रहा है।
मैं अपना ही साक्षी हो गया हूँ। 


आज कल मैं 'बाबू' हो गया हूँ - 
ये वृद्ध भी कितनी बचपना जगा देते हैं !

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

चिपट बैठो रिक्शे..

देखो 
बोगनबेल फूली
लखनबूटी शरमाई
शीत ऋतु आई।


रसिक ओस लिपटी
मंजरी हरसाई
तुलसी के बिरवा
सँवर ऋतु आई।


प्रात अलसाई
घड़ी को भुलाने
ओढ़ी रजाई। 
धुन्ध नज़रबन्द  
टोनहिन ठिठुराई
दुनिया भरमाई।



भीतर है सुरसुर
बाहर हवा सिसकाई।
चिपट बैठो रिक्शे 
ताके है 
झाँके है
दरम्याँ ये दूरी 
ठंडी पछुवाई।
शीत ऋतु आई।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

मेरे राम ...


मेरे राम                                                                                             
तुम कसौटी नायक हो। 
तुम सार्वकालिक अभागे हो। 
000 
मेरे सामने जाने कितने बाली हैं
आधी क्या पूरी ताकत हर लेते हैं। 
उनसे लड़ना है लेकिन छिपना नहीं है 
मैं तुम्हारे समान कायर नहीं। 
मेरी कसौटी है 
भले न लड़ूँ लेकिन      
उनके लिए वृक्ष अवश्य बनूँ 
ताकि मेरी आड़ ले 
वे मार सकें तुम्हारे जैसे मानवाधिकारों के हनक को। 
मैं इस तरह से खुले में खड़ा लड़ता रहता हूँ 
देखो कितने घाव खाए हैं- 
मैं तुम्हारी तरह कायर नहीं।
000
सीता की अग्नि परीक्षा तो जाने हुई या नहीं
पर अभी भी तुम उसकी कसौटी पर कसे जाते हो 
मानो मेरी बात 
जाने कितने उदारवादी और (चाहे जो) वादी हो गए 
प्रगतिशील हो गए 
तुम्हें अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कस कर। 
मैं तुम्हें कसता हूँ 
खग मृग तरु से सीता का हाल पूछ्ते तुम्हारे आँसुओं पर।
 सोचता हूँ कित्ता मूरख हूँ।
000
वे अभागे ऋषि महर्षि 
अस्थि क्षेत्रों में तप करते 
उनका मांस तक कोमल हो जाता था। 
सुस्वादु राक्षस भोज। 
राम तुम क्यों गए 
उन सुविधाभोगियों के लिए लड़ने
देखो  इस वातानुकूलित लाइब्रेरी में 
फोर्ड फाउंडेसन की स्कॉलरशिप जेब में डाले 
कितने लोग विमर्श कर रहे हैं 
इनकी कसौटी पर तुम हमेशा अपने को नकली पाओगे 
राम! तुम कितने अभागे हो।
000
जाने किन शक हूणों के चारण कवियों ने 
तुमसे शम्बूक वध करा डाला 
उसकी कसौटी से तुम्हें दलित साहित्य परख जाता है 
तुम उस कसौटी पर हो एक राजमद मत्त सम्राट
घनघोर वर्णवादी। 
मैं अपनी कसौटी हाथ लिए भकुवाया रहता हूँ 
कि तुम कसने से कुछ बच खुच गए हो 
तो कसूँ तुम्हें 
निषादराज के आलिंगन में 
चखूँ तुम्हें शबरी के जूठे बेरों में। 
कसूँ तुम्हें वानर भालुओं के 
उछाह भरे शौर्य पर
(दलित शोषित लिखूँ क्या
लेकिन वे तो इंसान हैं। 
बात चीत करते
परिवारी वानर भालुओं की तरह  
राक्षसों के आहार नहीं हैं वे)   
वह आत्मविश्वास कैसे भर गए थे उनमें 
खड़े हो गए वे नरमांस के आदियों के सामने 
आहार नहीं समाहार बन, उनका संहार बन। 
क्या वह केवल अपनी बीबी को वापस लाने को था 
ताकि तुम्हारा पौरुष फिर से गौरव पा सके
मेरी कसौटी कुछ अधिक बर्बर है 
लेकिन क्या करूँ
तुम्हें ऐसे न कसूँ तो प्रगतिशील कैसे कहाऊँ!
000
विभीषण को राक्षस राज्य सौंप 
सुग्रीव को वानर राज्य सौंप 
निषादराज को जंगल, नदी, वन का दायित्त्व सौंप 
तुम दरिद्र!
 ऐश्वर्य पा इतने बौरा गए!
हजारो अश्वमेध यज्ञ कर गए
राम !  
बड़ा विरोधाभासी चरित्र है तुम्हारा!! 
चरित्र की कसौटी पर तुम 'फेल' हो। 
000
लांछ्न  पर सीता को हकाल दिए 
कैसी पीड़ा थी राम! 
तुम्हारी रातें कैसी थीं राम 
भोग विलास आनन्द कैसे थे राम! 
सीता त्याग के बाद
मुआफ करना मुझे यह सब पूछ्ना है 
क्यों कि किसी सिरफिरे ने कहा है 
तुमने ग्यारह हजार साल राज किया 
सीता त्याग वाली बात उसी ने बताई थी 
सच ही कहा होगा। 
तुम नारी विरोधी ! 
मेरी कसौटी झूठ की कसौटी भले सही 
तुम्हें कसना तो होगा ही। 
(कोई मुझे बकवासी कह रहा है।)
000
तुम पाखंडी!
इतने निस्पृह अनासक्त थे तो 
सीता भू-प्रवेश के बाद 
लक्ष्मण को क्यों त्याग दिए
स्वयं आत्महत्या कर गए 
सरयू में छलांग लगा 
कैसी कसौटी थी वह राम
मुझे हैरानी होती है 
कोई तुम्हारी आत्महत्या की बात क्यों नहीं करता?
000
मेरे राम 
कसौटियाँ सेलेक्टिव हैं 
तुम हमेशा इन पर कसे जाओगे। 
तुम्हारे जन्मस्थान के कसौटी स्तम्भ नकली थे 
ढहा दिए गए।

इस ठिठुरती सर्दी में 
सम्राट राम ! 
किसी गरीब रिक्शेवाले के साथ  
तुम भी खुले में सो जाओगे। 
मेरी इस कविता पर कुछ लोग हँसेंगे 
कहेंगे इसे इसलिए दु:ख है कि 
सम्राट और रिक्शेवाला एक साथ क्यों हैं
मेरी कसौटी का संहार
मेरी बकवास और कंफ्यूजन का अंत 
हर सुबह होता है राम 
जब मैं सुनता हूँ 
जम्हाई लेते रिक्शेवाले के मुँह  से 
पहली आवाज़ 
हे राम 
मेरे राम . . .

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

पुरानी डायरी से - 8: गीताञ्जलि के लिए

_________, समय:__________                                                         गीताञ्जलि के लिए                                                   


प्रिय!

कल खड़ी थी तुम्हारे द्वार
रीतियों के वस्त्र पहने
परम्परा का कर श्रृंगार
तूने कपाट नहीं खोले
लौट गई मैं निराश -


आज फिर खड़ी द्वार
प्राकृतिक
वस्त्र हीना ।
बस कुंकुम अंकित भाल
प्रिय द्वार खोलो न -


नग्नता का अभिसार
कितना सुन्दर !


पहना दो आलिंगन वस्त्र
कर दो स्पर्श श्रृंगार
भर रोम रोम मादक रस धार।


प्रिय!
द्वार खोलो 
देखो
नग्नता कितनी सुन्दर है !