_________, समय:__________ गीताञ्जलि के लिए
प्रिय!
कल खड़ी थी तुम्हारे द्वार
रीतियों के वस्त्र पहने
परम्परा का कर श्रृंगार
तूने कपाट नहीं खोले
लौट गई मैं निराश -
आज फिर खड़ी द्वार
प्राकृतिक
वस्त्र हीना ।
बस कुंकुम अंकित भाल
प्रिय द्वार खोलो न -
नग्नता का अभिसार
कितना सुन्दर !
पहना दो आलिंगन वस्त्र
कर दो स्पर्श श्रृंगार
भर रोम रोम मादक रस धार।
प्रिय!
द्वार खोलो
देखो
नग्नता कितनी सुन्दर है !
