देखो
बोगनबेल फूली
लखनबूटी शरमाई
शीत ऋतु आई।
रसिक ओस लिपटी
मंजरी हरसाई
तुलसी के बिरवा
सँवर ऋतु आई।
प्रात अलसाई
घड़ी को भुलाने
ओढ़ी रजाई।
धुन्ध नज़रबन्द
टोनहिन ठिठुराई
दुनिया भरमाई।
भीतर है सुरसुर
बाहर हवा सिसकाई।
चिपट बैठो रिक्शे
ताके है
झाँके है
दरम्याँ ये दूरी
ठंडी पछुवाई।
शीत ऋतु आई।
