घर के सामने पसरी तरई भर धूप
निहाल रहती है -
बैठते हैं एक वृद्ध उसकी छाँव में
आज कल।
मैं सोचता हूँ -
कितनी उदास रही होगी
अकेली उपेक्षित धूप अब के पहले तक !
कल मैंने सुना घर को
सामने के पार्क से बतियाते
देखो, कौन आया है !
मैं समृद्ध हूँ
अतिरिक्त
आज कल मेरी दो साल पुरानी दीवारें
घेरे रहती हैं - पचहत्तर वर्षों की समय सम्पदा।
मैं द्रष्टा और अनुकरणशील हूँ
मुझ डिक्टेटर पर छा गया है अनुशासन -
डॉन आए हैं।
पिताजी आए हैं, आज कल।
घर के घेरे का सीमित यंत्रवत सा दैनन्दिन
प्राण धन पा उचक उछल दौड़ गया है -
बाहर ।
मैं देख रहा हूँ
घर को घेरे हुए हैं
स्नेह की रश्मियाँ
जैसे माँ के आँचल में सोया शिशु
धीमे धीमे मुस्कुरा रहा है।
मैं अपना ही साक्षी हो गया हूँ।
आज कल मैं 'बाबू' हो गया हूँ -
ये वृद्ध भी कितनी बचपना जगा देते हैं !
