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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

डॉन के साए में कविता. .


घर के सामने पसरी तरई भर धूप 
निहाल रहती है - 
बैठते हैं एक वृद्ध उसकी छाँव में 
आज कल।
मैं सोचता हूँ -
कितनी उदास रही होगी 
अकेली उपेक्षित धूप अब के पहले तक !

कल मैंने सुना घर को 
सामने के पार्क से बतियाते
देखो, कौन आया है ! 
मैं समृद्ध हूँ 
अतिरिक्त 
आज कल मेरी दो साल पुरानी दीवारें
घेरे रहती हैं - पचहत्तर वर्षों की समय सम्पदा।


मैं द्रष्टा और अनुकरणशील हूँ 
मुझ डिक्टेटर पर छा गया है अनुशासन - 
डॉन आए हैं। 
पिताजी आए हैं, आज कल।


घर के घेरे का सीमित यंत्रवत सा दैनन्दिन 
प्राण धन पा उचक उछल दौड़ गया है - 
बाहर । 
मैं देख रहा हूँ
घर को घेरे हुए हैं
स्नेह की रश्मियाँ
जैसे माँ के आँचल में सोया शिशु 
धीमे धीमे मुस्कुरा रहा है।
मैं अपना ही साक्षी हो गया हूँ। 


आज कल मैं 'बाबू' हो गया हूँ - 
ये वृद्ध भी कितनी बचपना जगा देते हैं !

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

वह

घोषित 'विराम' से थोड़ा विराम मिला तो ब्लॉगवाणी पर गया। पहली दृष्टि गई वर्तिका नन्दा की कविताओं पर आनन्द राय की एक पोस्ट पर। आनन्द जी की पोस्ट के बजाय मैं वर्तिका नन्दा के ब्लॉग पर गया तो वहाँ टिप्पणी के रूप में मुझे यह कविता दिखी, जो मैंने उन्हीं के शब्द उधार ले रच दिया था। उन्हों ने बहुत दिनों बाद इस टिप्पणी को प्रकाशित किया।

इतने छोटे विराम का लाभ ले यही कविता पोस्ट कर रहा हूँ। शब्द (शायद भाव भी) साभार: सुश्री वर्तिका नन्दा
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दिन
साबुन
ख्याल
धूप।

हमने
सपने धो
डाल दिए
सूखने।

सूनी आँख
साथ रात
जो जगी
वह कविता थी।

मंगलवार, 12 मई 2009

प्रार्थना - ब्लॉग पर मेरी पहली कविता

धूप!
आओ,अंधकार मन गहन कूप
फैला शीतल तम ।मृत्यु प्रहर
भेद आओ। किरणों के पाखी प्रखर
कलरव प्रकाश गह्वर गह्वर
कर जाओ विश्वास सबल ।
तिमिर प्रबल माया कुहर
हो छिन्न भिन्न। सत्त्वर अनूप
आओ। अंधकार मन गहन कूप
भेद कर आओ धूप।