निवेदन और नरक के रस्ते - 1
नरक के रस्ते - 2
नरक के रस्ते - 3
नरक के रस्ते – 4
नरक के रस्ते - 5 से जारी....
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शेर मर रहे हैं बाहर सरेह में
खेत में
झुग्गियों में
झोपड़ियों में
सड़क पर..हर जगह
सारनाथ में पत्थर हम सहेज रहे हैं
जय हिन्द।
मैं देखता हूँ
छ्त के छेद से
लाल किले के पत्थर दरक रहे हैं।
राजपथ पर कीचड़ है
बाहर बारिश हो रही है
मेरी चादर भीग रही है।
धूप भी खिली हुई है -
सियारे के बियाह होता sss
सियारों की शादी में
शेर जिबह हो रहे हैं
भोज होगा
काम आएगा इनका हर अंग, खाल, हड्डी।
खाल लपेटेगी सियारन सियार को रिझाने को
हड्डी का चूरन खाएगा सियार मर्दानगी जगाने को ..
पंडी जी कह रहे हैं - जय हिन्द।
अम्माँ ssss
कपरा बत्थता
बहुत तेज घम्म घम्म
थम्म!
मैं परेड का हिस्सा हूँ
मुझे दिखलाया जा रहा है -
भारत की प्रगति का नायाब नमूना मैं
मेरी बकवास अमरीका सुनता है, गुनता है
मैं क्रीम हूँ भारतीय मेधा का
मैं जहीन
मेरा जुर्म संगीन
मैं शांत प्रशांत आत्मा
ॐ शांति शांति
घम्म घम्म, थम्म !
परेड में बारिश हो रही है
छपर छपर छ्म्म
धम्म।
क्रॉयोजनिक इंजन दिखाया जा रहा है
ऑक्सीजन और हाइड्रोजन पानी बनाते हैं
पानी से नए जमाने का इंजन चलता है
छपर छपर छम्म।
कालाहांडी, बुन्देलखण्ड, कच्छ ... जाने कितनी जगहें
पानी कैसे पहुँचे - कोई इसकी बात नहीं करता है
ये कैसा क्रॉयोजेनिक्स है!
चन्नुल की मेंड़ और नहर का पानी
सबसे बाद में क्यों मिलते हैं?
ये इतने सारे प्रश्न मुझे क्यों मथते हैं?
घमर घमर घम्म।
रात घिर आई है।
दिन को अभी देख भी नहीं पाया
कि रात हो गई
गोया आज़ाद भारत की बात हो गई।
शाम की बात
है उदास बुखार में खुद को लपेटे हुए।
खामोश हैं जंगी, गोड़न, बेटियाँ, गुड्डू
सो रहे हैं कि सोना ढो रहे हैं
जिन्हें नहीं खोना बस पाना !
फिर खोना और खोते जाना..
सोना पाना खोना सोना ....
जिन्दगी के जनाजे में पढ़ी जाती तुकबन्दी।
इस रात चन्नुल के बेटे डर रहे हैं
रोज डरते हैं लेकिन आज पढ़ रहे हैं
मौत का चालीसा - चालीस साल
लगते हैं आदमी को बूढ़े होने में
यह देश बहुत जवान है।
जवान हैं तो परेड है
अगस्त है, जनवरी है
जवान हैं परेड हैं
अन्धेरों में रेड है।
मेरी करवटों के नीचे सलवटें दब रही हैं
जिन्दगी चीखती है - उसे क्षय बुखार है।
ये सब कुछ और ये आजादी
अन्धेरे के किरदार हैं।
मेरी बड़बड़ाहट
ये चाहत कि अन्धेरों से मुक्ति हो
ये तडपन कि मुक्ति हो।
मुक्ति पानी ही है
चाहे गुजरना पड़े
हजारो कुम्भीपाकों से ।
कैसे हो कि जब सब ऐसे हो।
ये रातें
सिर में सरसो के तेल की मालिश करते
अम्माँ की बातें
सब खौलने लगती हैं
सिर का बुखार जब दहकता है।
और?
.. और खौलने लगता है
बालों में लगा तेल
अम्माँ का स्नेह ऐसे बनता है कुम्भीपाक।
(हाय ! अब ममता भी असफल होने लगी है।)
माताएँ क्या जानें कि उनकी औलादें
किन नरकों से गुजर रही हैं !
अब जिन्दगी उतनी सीधी नहीं रही
जिन्दगी माताओं का स्नेह नहीं है।
भीना स्नेह खामोश होता है...
सब चुप हो जाओ।
अम्माँ, मुझे नींद आ रही है..जाओ सो जाओ।
..एक नवेली चौखट पर रो रही है
मुझे नींद आ रही है...