शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

रात

'रात'


ओस को चुपके बताते चलो 
आज बहुत हताश है रात।


पीपल सजे मोद माते कितने
जुगनुओं से कहो 
कि उदास है रात।


ठिठुरन सरगोशी कानों के पास
गर्म साँसों ठहरो,
नहीं आज आस है रात।


दिए बुझ गए तुम आई न आज 
कुहर भोर पहरे
अकेले बहकती काश है रात।


कोई सिसक रहा खाँसियों के पीछे
तनी जीवन मसहरी,
मृत्यु के पास है रात।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

पुरानी डायरी से -4 : काम कविता

13 दिसम्बर 1993, समय: ________                               '____ के लिए' 
  
कभी कभी सोचता हूँ
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र 
और बातें करते हैं तुम्हारे अंग अंग से 
(मुझे ईर्ष्या होती है !)
कैसा होगा वह शरीर !


तुलसी के पत्ते पर
प्रात:काल में चमकती 
जुड़वा ओस की बूँदे
धवल पीन युगल वे स्तन
क्या वैसे ही होंगे ?


सुदूर फैला सपाट मैदान
सूना सा शांत सौन्दर्य 
क्षितिज पर कहीं पोखरे का आभास।
तुम्हारा नाभिस्थल ऐसा ही होगा।


हिमश्वेत उन्नत श्रृंगों के बीच 
बहती विद्रोही पहाड़ी नदी
परिपूर्ण यौवन वेगमय प्रवाह।
हाँ ऐसा ही होगा तुम्हारा जघन स्थल।
....
कभी कभी सोचता हूँ
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र ।
कभी कभी मैं सोचता हूँ। 

बुधवार, 30 सितंबर 2009

देहात - साँझ, रात, भिनसार

साँझ
नहीं ठाँव
तारों के पाँव।


पीपल
पल पल
जुगनू द्ल।


गीत
सुने माय
मुँह बाय।


पावर
रोशनी कट
ढेबरी सरपट।


चाँद
फेंक प्रकाश
लानटेन भँड़ास।


मच्छर
गुमधुम
लोग सुमसुम।


श्वान
संभोग दल
रव बल छल।


फूल
पौधों के शूल
रजनी दुकूल।




ओस
रही कोस
बारिश भरोस।


....
....
बयार
हरसिंगार
धरती छतनार।










_________
ये हिमांशु जी की टोकारी पर:

सेंक
रोटी फेंक
चूल्हा टेक।
__________ 

सोमवार, 21 सितंबर 2009

अन्ना ! नहीं तोड़ा जाता ।

तुम्हारी उंगली पकड़ 
यहाँ मैंने चलना सीखा ।
पैर कहाँ रखें कैसे रखें 
तुमसे सीखा ।
तुमसे हुए जाने कितने सम्वाद 
सुलझाते रहे गुत्थियों को।


अचानक इतने चुप क्यों हो गए?
चुप्पी भी ऐसी कि कुरेदने से न टूटे !
....
मौन तुम्हारा अपना वरण है।
मुझे उस पर कुछ नहीं कहना ।
लेकिन मैं अब किसे ढूढूँ 
अपना मौन तोड़ने को ?
.....
भीतर का हाहाकारी मौन 
जिस किसी के आगे नहीं तोड़ा जाता
अन्ना ! नहीं तोड़ा जाता।

रविवार, 6 सितंबर 2009

पुरानी डायरी से - 2

.... अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ - पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह - जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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इसके पहले पुरानी डायरी से - 1


6 अप्रैल 1993, समय: रात्रि 1110                                'नश्वर'


हाँ यह शरीर नश्वर !
पूजित पहचान अमर
हाँ यह शरीर नश्वर।


स्वागत तिरस्कार
सौन्दर्य अभिसार
जीवंत काम अध्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।


नीड़ का निर्माण
वेदना निर्वाण
उद्घोष प्राण सस्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।