13 दिसम्बर 1993, समय: ________ '____ के लिए'
कभी कभी सोचता हूँ
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र
और बातें करते हैं तुम्हारे अंग अंग से
(मुझे ईर्ष्या होती है !)
कैसा होगा वह शरीर !
तुलसी के पत्ते पर
प्रात:काल में चमकती
जुड़वा ओस की बूँदे
धवल पीन युगल वे स्तन
क्या वैसे ही होंगे ?
सुदूर फैला सपाट मैदान
सूना सा शांत सौन्दर्य
क्षितिज पर कहीं पोखरे का आभास।
तुम्हारा नाभिस्थल ऐसा ही होगा।
हिमश्वेत उन्नत श्रृंगों के बीच
बहती विद्रोही पहाड़ी नदी
परिपूर्ण यौवन वेगमय प्रवाह।
हाँ ऐसा ही होगा तुम्हारा जघन स्थल।
....
कभी कभी सोचता हूँ
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र ।
कभी कभी मैं सोचता हूँ।