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शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

रात

'रात'


ओस को चुपके बताते चलो 
आज बहुत हताश है रात।


पीपल सजे मोद माते कितने
जुगनुओं से कहो 
कि उदास है रात।


ठिठुरन सरगोशी कानों के पास
गर्म साँसों ठहरो,
नहीं आज आस है रात।


दिए बुझ गए तुम आई न आज 
कुहर भोर पहरे
अकेले बहकती काश है रात।


कोई सिसक रहा खाँसियों के पीछे
तनी जीवन मसहरी,
मृत्यु के पास है रात।