गाँव का आसमान
वत्सल वत्सल
परदेसी लाल आया है!
'चित्रा' हरसाई
धा धा आई
श्वेत श्याम आँचल में
बाँध के रखा था
खुल गए बन्ध।
बरस रही नेह धार
धरती तर तरल तरल।
हरसिंगार! तुमने बिखरा दिए
तज दिए साज शृंगार।
ये जो भूमि पर बिखरे हैं
जो रह गए अटके ही
मेरी पूजा के ही पुष्प हैं !
जिन्हें बीनते हैं लोग
देवी की आराधना हेतु।
जिन्हें यूँ ही बिखेर दिया -
पूरे परिवेश में
उन्हें
मैं किस हेतु सहेजूँ?
किसके लिए??