गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

दुनिया उसी से कायम है

"तुम्हें पढ़ना चाहता हूँ"
"मैं अन्धी हो चुकी हूँ"
"तुम्हें लिखना चाहता हूँ"
"मेरे हाथ अब काँपते हैं"
"तुम्हें छूना चाहता हूँ"
"मेरे अंग गलित हैं"
"इस बार मेरे की जगह तुम्हारे कहना था"
"एक ही बात है। 
 पढ़ना, लिखना, छूना सब बेमानी हैं
अपने भीतर झाँक लो, सब हो जाएगा"
"तुम नहीं सुधरोगी"
"तुम भी तो नहीं सुधर पाए" 
"हाँ, कुछ है जो कभी नहीं बदलता "
"दुनिया उसी से कायम है"    

12 टिप्‍पणियां:

  1. " कुछ है जो कभी नहीं बदलता "

    शायद इसी को शाश्वत सत्य कहा गया है.

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  2. द्वैध का प्रेत क्यों बन जाते हैं ये रिश्ते

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  3. अलहदा धूनी रमाये रहिये ! कविता बढ़िया है !

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  4. ाच्छा है कुछ तो है जो नही बदलता नही तो आप कैसे इतनी रचनायें लिख पाते। शुभकामनायें।

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  5. कविता का शिल्प नया-नया सा लगा...अति सुंदर।

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  6. अब घर से लौट आये तो तनिक प्रेम कथा को भी आगे ठेलिए.

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  7. बहुत खूब!
    अनकहा भी कह दिया आखिरी पंक्ति में.

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