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गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

दुनिया उसी से कायम है

"तुम्हें पढ़ना चाहता हूँ"
"मैं अन्धी हो चुकी हूँ"
"तुम्हें लिखना चाहता हूँ"
"मेरे हाथ अब काँपते हैं"
"तुम्हें छूना चाहता हूँ"
"मेरे अंग गलित हैं"
"इस बार मेरे की जगह तुम्हारे कहना था"
"एक ही बात है। 
 पढ़ना, लिखना, छूना सब बेमानी हैं
अपने भीतर झाँक लो, सब हो जाएगा"
"तुम नहीं सुधरोगी"
"तुम भी तो नहीं सुधर पाए" 
"हाँ, कुछ है जो कभी नहीं बदलता "
"दुनिया उसी से कायम है"