तुम्हारे खामोश कान
तुम्हारी बहरी जुबान
मुझे चेताते हैं - चुप रहो।
लेकिन शायद तुम्हें नहीं पता
खामोशी की बदबू
ठुस्की से भी खराब होती है।
मुझे बदबू से चिढ़ है।
इसलिए
मुझे चुप नहीं कराया जा सकता !
जब तुम मुझे देखते हो
तो तुम्हारी आँखों से
बास निकलती दिखाई देती है।
मैं नाक सिकोड़ता हूँ
और तुम्हें लगता है कि
मुझे तुम्हारी बात से इत्तेफाक नहीं!
अरे, इत्तेफाक का सवाल तो सुनने के बाद आता है !
मेरे कान बहरे हैं
और
जुबान चलती है।
मेरे यहाँ सीधा हिसाब चलता है।
मैं चिल्लाऊँगा - पेट से
मेरी चिल्लाहट समा जाएगी
तुम्हारी कब्ज ग्रस्त अंतड़ियों में
और तुम टॉयलेट की ओर दौड़ पड़ोगे
चिंतन करने ?
नहीं अपनी सड़ांध निकालने।
तुमने मुझे इसबगोल बना दिया है !
अपने अन्दर की सडाँध को याद रखो
बहुत प्रेम है न तुम्हें उससे?
लेकिन यह भी याद रखो
कि
इसबगोल का यह पैकेट कभी खत्म नहीं होगा !....
सा...
जो दूसरों की हैं, कवितायें हैं। जो मेरी हैं, -वितायें हैं, '-' रिक्ति में 'स' लगे, 'क' लगे, कुछ और लगे या रिक्त ही रहे; चिन्ता नहीं। ... प्रवाह को शब्द भर दे देता हूँ।
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009
एक बकवासमय टिप्पणी
हम यहाँ पर निम्नलिखित टिपियाए हैं:
ये जमाना मूर्तिमान उलटबाँसी है।
गिद्ध खतम हो गए,
दुष्ट कबूतरों के शहरों पर हमले हैं। ..
बरतन मॉल की रसोई में खड़कते हैं।..
मॉल के सामने सड़क पर
ईंट बिछौना ईंट तकिया डाल
हेल्पर सोते हैं।
राजनीति में नीति नहीं
जन में विद्रोह नहीं
आप जनद्रोहिता की बात करते हैं !
कैसा धर्म कैसा साम्राज्य
?
आज कल के अशोक भी
धर पकड़ के समर तले
जय जय करते हैं।
किसकी?
वही तो !
अरे वही तो पेंच है !
+++++++++++
ये जमाना मूर्तिमान उलटबाँसी है।
गिद्ध खतम हो गए,
दुष्ट कबूतरों के शहरों पर हमले हैं। ..
बरतन मॉल की रसोई में खड़कते हैं।..
मॉल के सामने सड़क पर
ईंट बिछौना ईंट तकिया डाल
हेल्पर सोते हैं।
राजनीति में नीति नहीं
जन में विद्रोह नहीं
आप जनद्रोहिता की बात करते हैं !
कैसा धर्म कैसा साम्राज्य
?
आज कल के अशोक भी
धर पकड़ के समर तले
जय जय करते हैं।
किसकी?
वही तो !
अरे वही तो पेंच है !
+++++++++++
शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
रात
'रात'
ओस को चुपके बताते चलो
आज बहुत हताश है रात।
पीपल सजे मोद माते कितने
जुगनुओं से कहो
कि उदास है रात।
ठिठुरन सरगोशी कानों के पास
गर्म साँसों ठहरो,
नहीं आज आस है रात।
दिए बुझ गए तुम आई न आज
कुहर भोर पहरे
अकेले बहकती काश है रात।
कोई सिसक रहा खाँसियों के पीछे
तनी जीवन मसहरी,
मृत्यु के पास है रात।
ओस को चुपके बताते चलो
आज बहुत हताश है रात।
पीपल सजे मोद माते कितने
जुगनुओं से कहो
कि उदास है रात।
ठिठुरन सरगोशी कानों के पास
गर्म साँसों ठहरो,
नहीं आज आस है रात।
दिए बुझ गए तुम आई न आज
कुहर भोर पहरे
अकेले बहकती काश है रात।
कोई सिसक रहा खाँसियों के पीछे
तनी जीवन मसहरी,
मृत्यु के पास है रात।
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009
पुरानी डायरी से -4 : काम कविता
13 दिसम्बर 1993, समय: ________ '____ के लिए'
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर ! जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र
और बातें करते हैं तुम्हारे अंग अंग से
(मुझे ईर्ष्या होती है !)
कैसा होगा वह शरीर !
तुलसी के पत्ते पर
प्रात:काल में चमकती
जुड़वा ओस की बूँदे
धवल पीन युगल वे स्तन
क्या वैसे ही होंगे ?
सुदूर फैला सपाट मैदान
सूना सा शांत सौन्दर्य
क्षितिज पर कहीं पोखरे का आभास।
तुम्हारा नाभिस्थल ऐसा ही होगा।
हिमश्वेत उन्नत श्रृंगों के बीच
बहती विद्रोही पहाड़ी नदी
परिपूर्ण यौवन वेगमय प्रवाह।
हाँ ऐसा ही होगा तुम्हारा जघन स्थल।
....
कभी कभी सोचता हूँ
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र ।
कभी कभी मैं सोचता हूँ।
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