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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

आत्मदीपो भव

आत्मदीपो भव!
अप्प दीपो भव!
अपने प्रकाश स्वयं बनो। 
अपनी रोशनी तुम्हें खुद तलाशनी होगी। 
Be your own torch bearer. 

चाहे जैसे कहो, लब्बो लुआब ये कि करना खुद को ही है। 
तो आज दिया बन कितना जलने का प्रोग्राम है? 

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

आज के दिन कोई रोता है भला?

जल ले मन दीपक सुघर, बाती नहीं न तेल सजल, जल ले मन अँजोर जोर। 
कब था सब शुभ धवल, कब थे नहीं काले जलद, न बुझ, जल मन मनजोर।
गोधूलि होंगी राहें विकल, चाह होगी पर धीर बरज, लहक टपकी आँख कोर।
जल ले मन अँजोर जोर मनजोर टपकी आँख कोर।

भूख बैठी डार पर 
घुघ्घू चले शृंगार पर 
लक्ष्मी लुटे लौंजार पर। 
क्या हुआ जो छ्न्द टूटे 
क्या हुआ जो बन्द फूटे 
तुम जमे रहो जेवनार पर 
शान पट्टी मार कर। 

खाँसता जो गीत किसका मीत
निचोड़ ले हर बूँद ऐसी प्रीत 
यह जीना चबेना माल पर 
जो मैल बदबू हर साँस पर 
चढ़ गई ज़िन्दगी शान पर 
तुम जमे रहो जेवनार पर 
टँगे रहो निस्तार पर। 

करूँ क्या मौसम तो आएँगे ही, हँस लूँ, एक दिन फुलझड़ी छोड़ लूँ 
आरती सजा पूज लूँ उल्लुओं की मात को।
हाँ रहेंगे हमेशा मैल बदबू 
खाँसते गीत होंगे शान पट्टी निस्तार पर 
नाचता दलिद्दर होगा हमारी ताल पर 
साल भर, 
दीपावली तो फिर भी आएगी ही 
मना लूँ।
न कहो
जल ले मन अँजोर जोर मनजोर टपकी आँख कोर।
आज के दिन कोई रोता है भला?