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शनिवार, 15 मई 2010

बेहयाई हूँ मैं।

हिन्दी ब्लॉगरी का वही हाल है जो हिन्दुस्तान का है।
मन खिन्न हुआ और चन्द द्विपदियाँ रच गईं, प्रस्तुत हैं। 


शाद कोई नहीं तमाशाई हूँ मैं 
तेरी पीर से चीखूँ, भाई हूँ मैं।

क़ाफिर इस तरफ गद्दार उस तरफ  
दीवार से उठती दुहाई हूँ मैं।


ढूढ़ें आलिम-ए-बहर अन्दाजे बयाँ 
एक सीधी सी सच्ची रुबाई हूँ मैं। 


बुतखाने न जाऊँ न कलमा पढ़ूँ 
मौलवी का पड़ोसी ढिठाई हूँ मैं। 


लुटी सारी ग़रीबी नंगों के हाथ 
बची बस्ती की गाढ़ी कमाई हूँ मैं। 


बड़े अहमकाना सूरमा-ए-महफिल 
मुझको आए हँसी बेहयाई हूँ मैं।