अभिषेक कुशवाहा को पढ़ना अपने आप में एक गहन, सघन और अलग अनुभव है। सम्भवत: आप गहन और सघन के एक साथ प्रयोग को देख चौंकें लेकिन मुझे यह उपयुक्त लग रहा है।
अनुभव ऐसा
जैसे कोई अनजानी सुगन्ध
धीरे से कहीं से उड़ आ कर
सक्रिय कर दे संवेदी रोम
मुग्ध से चल दें पीछे आँखें मींचे।
बढ़ें ज्यों ज्यों
महकने लगे समूचा अस्तित्त्व।
आप हो जाँय स्नात - गन्ध गन्ध, छन्द छन्द ...
भीग उठें सहज लय प्रवाही काव्यधारा में
ठिठुरन की सीमा तक
हर कम्पन खोले नए नए अर्थ,
प्रगाढ़ कविता नवरस बरसाती
भीन उठे अस्तित्त्व के पोर पोर ।
ऐसी कविता, जो
- सम्वेदना, कोमलता और अनुभव के वैविध्य को सार्वकालिक व्याकरण में बाँधती है और फिर भी मुक्त रहती है,
- कहीं आप के अनकहे बँधे से भावों को मुक्त करती है।
पढ़नी हो तो इनके ब्लॉग आर्जव पर जाएँ।
ब्लॉग पर कम रचने वाले आर्जव का मंत्र है - सहज, सरल, सतत ...।
एक और रहस्य यह है कि अभिषेक सर्वप्रिय कवि ब्लॉगर हिमांशु कुमार पाण्डेय के छात्र रहे हैं। इनकी अभी की कविता फिर उथले किनारों से ही लौट आए हैं ! से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ। इन पंक्तियों की प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। नि:शब्द हूँ:
सांझ की नीलम पट्टिका ओढ़
सुदूर बहुत सलिल तीरे ,स्तब्ध
सो रही है जो हरे गाछों की घनी बस्ती
जिन पर चांद से चुरायी चन्द्रिका को
बना अच्छत छींटते हैं प्रकाश कीट
विशाल वृक्ष जिनमें , अर्द्ध-मुखरित , स्तिमित
कर रहें हैं श्रेयस सांध्य गीत मौन वाचन
मौन ही की धुन पर , लयमयी , सुरमयी
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१.सुबह
------
चीड के पेड़ों पर उतरी
अनमनी अलसाई भोर ने
मलते हुए आँखें खोलीं
और एक अजनबी को ताकते देख
कुछ झिझकी , कुछ शरमाई
फिर कोहरे का घूँघट काढ लिया.
ठंड खाए सूरज ने खंखारा
भोर कुछ और सिमटी .
दो अँगुलियों से घूंघट टार कर
उसने कनखियों से अजनबी को देखा,
अजनबी ने बाहें फैला दीं
दूर तक की घाटियाँ समेट लेने भर
और हलका- सा मुस्कुरा दिया.
समय पहले थमा
कुछ देर जमा
और फिर पिघलकर सुबह बन गया.
२. दोपहर
---------------
सूरज आज छुट्टी पर है.
चंचला घाटियों ने न्यौत दिया एक-दूसरे को
दिन से बद ली शर्त
और छिप गयीं जाकर दूर-दूर
हरे दरख्तों के पीछे.
दिन ने कहा-- आउट
एक घाटी निकल आई बाहर
फिर दूसरी , फिर तीसरी
एक-एककर सभी घाटियाँ निकल आयीं बाहर
आउट होकर .
रह गयी एक घाटी
सबसे छोटी
दुधमुहें बच्चे-सी
मनुष्यों के जंगल में खोकर.
डांट खाई घाटियाँ
तलाशती रहीं रुआंसी हो
तमाम दोपहर,
अमर्ष से भर-भर आयीं
बार-बार.
३.सांझ
-----------
रिज की रेलिंगों पर कुहनियाँ टिकाये
ललछौहीं शाम
झांकती रही घाटी में
देर.... बहुत दे....र तक...
तब तक, जब तक कि
चिनार सो नहीं गए,
सड़कें चलीं नहीं गयीं अपने घर
और कुंवारी हवाएं लौट नहीं आयीं
दिन भर खटने के बाद.
४.रात : अमावस की
-----------
सो गए हैं सब
चिनार और कबूतर
झरने की लोरियां सुनते.
सज चुकी है
सलमे-सितारे जड़ी पोशाक पहन
अभिसारिका घाटी.
रह-रहकर देखती है निरभ्र आकाश--
मुझसे तो कम ही हैं!
गहराई रात और
टिक गयीं क्षितिज पर आँखें
एकटक...
न निकलना था
न निकला चाँद .
आहतमना
पूरितनयना
एक-एककर तोड़ती रही सितारे
फेंकती रही आकाश में
सो जाने तक.
आर्जव पर यह पोस्ट लिखने के बाद एक और ब्लॉग डीहवारा पर पहुँचा। सच मानिए अगर आर्जव को पढ़ कर मुग्ध हो नाच की अवस्था में आ गया था तो रजनी कांत ( kant:)) के इस ब्लॉग पर पहुँच कर स्तब्ध रह गया !
सम्मोहित सा पोस्ट दर पोस्ट पढ़ता गया। लगा जैसे मेरा परिष्कृत 'मैं' रच रहा हो। ढेर सारी टिप्पणियाँ कर आया।
और उनकी कविता शिमला: जैसा मैंने देखा ने तो जैसे विवश कर दिया कि आप को बताऊँ। 8 टिप्पणियों के बाद (अदा जी के बाद) यह अंश जोड़ रहा हूँ।
आप देखिए यह कविता:
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चीड के पेड़ों पर उतरी
अनमनी अलसाई भोर ने
मलते हुए आँखें खोलीं
और एक अजनबी को ताकते देख
कुछ झिझकी , कुछ शरमाई
फिर कोहरे का घूँघट काढ लिया.
ठंड खाए सूरज ने खंखारा
भोर कुछ और सिमटी .
दो अँगुलियों से घूंघट टार कर
उसने कनखियों से अजनबी को देखा,
अजनबी ने बाहें फैला दीं
दूर तक की घाटियाँ समेट लेने भर
और हलका- सा मुस्कुरा दिया.
समय पहले थमा
कुछ देर जमा
और फिर पिघलकर सुबह बन गया.
२. दोपहर
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सूरज आज छुट्टी पर है.
चंचला घाटियों ने न्यौत दिया एक-दूसरे को
दिन से बद ली शर्त
और छिप गयीं जाकर दूर-दूर
हरे दरख्तों के पीछे.
दिन ने कहा-- आउट
एक घाटी निकल आई बाहर
फिर दूसरी , फिर तीसरी
एक-एककर सभी घाटियाँ निकल आयीं बाहर
आउट होकर .
रह गयी एक घाटी
सबसे छोटी
दुधमुहें बच्चे-सी
मनुष्यों के जंगल में खोकर.
डांट खाई घाटियाँ
तलाशती रहीं रुआंसी हो
तमाम दोपहर,
अमर्ष से भर-भर आयीं
बार-बार.
३.सांझ
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रिज की रेलिंगों पर कुहनियाँ टिकाये
ललछौहीं शाम
झांकती रही घाटी में
देर.... बहुत दे....र तक...
तब तक, जब तक कि
चिनार सो नहीं गए,
सड़कें चलीं नहीं गयीं अपने घर
और कुंवारी हवाएं लौट नहीं आयीं
दिन भर खटने के बाद.
४.रात : अमावस की
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सो गए हैं सब
चिनार और कबूतर
झरने की लोरियां सुनते.
सज चुकी है
सलमे-सितारे जड़ी पोशाक पहन
अभिसारिका घाटी.
रह-रहकर देखती है निरभ्र आकाश--
मुझसे तो कम ही हैं!
गहराई रात और
टिक गयीं क्षितिज पर आँखें
एकटक...
न निकलना था
न निकला चाँद .
आहतमना
पूरितनयना
एक-एककर तोड़ती रही सितारे
फेंकती रही आकाश में
सो जाने तक.