गुरुवार, 31 जनवरी 2013

तुम सुन्दर हो

सब कह गये सब कुछ तुम्हारी प्रशंसा में,
कुछ भी न बचा
मैं कहता हूँ - तुम सुन्दर हो,
इतनी सादी ईमानदारी से किसी ने न कहा
इतनी ईमानदार शादगी से किसी ने न कहा!

बुधवार, 30 जनवरी 2013

वो और रोटी चटनी स्वाद

वो ढूँढ़ ही लेती है
चटनी के उद्यम सामान
और तुम पाते हो
उसी रोटी में एक नया स्वाद।
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(चित्र स्रोत आभार: http://smalltowndiary.wordpress.com/2010/09/01/sil-batta/)

शनिवार, 26 जनवरी 2013

...

इस ठंड की आदत नहीं ये आनी जानी है 
शिकायतों सिसकियों में बस यही आसानी है।
ठिठुरते आह भरते हम सिहरते हैं 
गुलदश्ते आते जाते हैं हम बस वैसे ही रहते हैं 
कालिख पुते चेहरे पर पंखुड़ियाँ सजानी हैं 
गिरें धूल में कुचलें पाँव तले यही कहानी है।  

रविवार, 20 जनवरी 2013

नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ

नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ 
अब भी लिखती हैं अंतर्देसी चिट्ठियाँ।

बाबा धुलने को दे देते हैं
गन्दी अपनी धोतियाँ।
मोर्ही वाली छोड़ एक ग़ायब हो जाती हैं सभी
ताखे पर बिखरी किसिम किसिम की चुनौटियाँ
मुस्कुराते घूमते हैं कभी इधर कभी उधर
चुपके चुपके सहेजते हैं कहने को ढेरों कहानियाँ।

ईया गिरते केशों में 
फेरने लगती हैं कंघियाँ।
ढील खुजली हेरन बातों में बकबक फेरन को
माज माज मन चमकाती हैं मन मन भारी गालियाँ
जतन भर सँवारती हैं टुटहे बक्से में रखे आशीष
लेकिन नहीं भूलती हैं छिपाना अपनी बालियाँ।

ले खरहरा जाला मारें
पापा झाड़ें खिड़कियाँ।
पिटती है धौंक कुदारी दुअरा पर मोथा छीलन को
उमड़ उछाह देख पलायित बिदाई वाली सिसकियाँ
झोला भर लाते पापड़ चिउड़ा सिरका अमचूर
पूछ पूछ तस्दीकें घरनी से कैसे बनती हैं मछलियाँ?

पोते चेहरे की झाँइयों पर
छिपा बहुओं से लभलियाँ।
जोर जुटा जमा ठसक हो जाती है जवाँ पुन:
याद दिलाने लगती घरनी सुघर सराही झिड़कियाँ
कड़वी जीभ से परखे सब नकचढ़ ज़िद्दी मोर धिया          
छोड़ देती है तवे पर माँ फुलाना रोटियाँ।
  
गिनने लगते हैं मनसुख काका
चेहरे पर की झुर्रियाँ।
खिचड़ी मूँछ आवारा बाल चुभते हैं आँखों में
बात बेबात हजामत में देने लगते हैं झिड़कियाँ
बारी के सबुजा आम टिकोरे कीमती कचहरी कागद से
काटने को कच्चे कचालू चमकाने लगते हैं छूरियाँ। 

सहमने लगती हैं यूँ ही -
ननद के भाइयों से उसकी भाभियाँ
जब पढ़ती हैं चिकोटती सी चिट्ठियाँ। 


नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ
अब भी लिखती हैं अंतर्देसी चिट्ठियाँ। 

बुधवार, 9 जनवरी 2013

शांती बेवस्था बनाये रखिये।

शांती बेवस्था बनाये रखिये। 
"घुसपैठ भई तो सेना क्या कर रही थी?"खबीश को ये पूछने दीजिये। 
मने कि लाख टके का कोश्चन है, करने दीजिये।
खुद अपने को भूलने दीजिये।
मूड़ काटने वाले को काटने दीजिये। 
लैनतोड़वा को आगे से टीकस लेने दीजिये। 
घूस देते रहिये, काम चलाते रहिये।
मौका मिलने पर कमरा ओढ़ घीव पीते रहिये। 
परधान को सब ठीक है कहने दीजिये।
उनको फिर फिर गद्दी बैठाते रहिये 
और बेवस्था को गरियाते रहिये। 
शांती बेवस्था बनाये रखिये!