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रविवार, 20 जनवरी 2013

नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ

नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ 
अब भी लिखती हैं अंतर्देसी चिट्ठियाँ।

बाबा धुलने को दे देते हैं
गन्दी अपनी धोतियाँ।
मोर्ही वाली छोड़ एक ग़ायब हो जाती हैं सभी
ताखे पर बिखरी किसिम किसिम की चुनौटियाँ
मुस्कुराते घूमते हैं कभी इधर कभी उधर
चुपके चुपके सहेजते हैं कहने को ढेरों कहानियाँ।

ईया गिरते केशों में 
फेरने लगती हैं कंघियाँ।
ढील खुजली हेरन बातों में बकबक फेरन को
माज माज मन चमकाती हैं मन मन भारी गालियाँ
जतन भर सँवारती हैं टुटहे बक्से में रखे आशीष
लेकिन नहीं भूलती हैं छिपाना अपनी बालियाँ।

ले खरहरा जाला मारें
पापा झाड़ें खिड़कियाँ।
पिटती है धौंक कुदारी दुअरा पर मोथा छीलन को
उमड़ उछाह देख पलायित बिदाई वाली सिसकियाँ
झोला भर लाते पापड़ चिउड़ा सिरका अमचूर
पूछ पूछ तस्दीकें घरनी से कैसे बनती हैं मछलियाँ?

पोते चेहरे की झाँइयों पर
छिपा बहुओं से लभलियाँ।
जोर जुटा जमा ठसक हो जाती है जवाँ पुन:
याद दिलाने लगती घरनी सुघर सराही झिड़कियाँ
कड़वी जीभ से परखे सब नकचढ़ ज़िद्दी मोर धिया          
छोड़ देती है तवे पर माँ फुलाना रोटियाँ।
  
गिनने लगते हैं मनसुख काका
चेहरे पर की झुर्रियाँ।
खिचड़ी मूँछ आवारा बाल चुभते हैं आँखों में
बात बेबात हजामत में देने लगते हैं झिड़कियाँ
बारी के सबुजा आम टिकोरे कीमती कचहरी कागद से
काटने को कच्चे कचालू चमकाने लगते हैं छूरियाँ। 

सहमने लगती हैं यूँ ही -
ननद के भाइयों से उसकी भाभियाँ
जब पढ़ती हैं चिकोटती सी चिट्ठियाँ। 


नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ
अब भी लिखती हैं अंतर्देसी चिट्ठियाँ। 

रविवार, 15 जुलाई 2012

...हो ही नहीं पाता


गेरुये, धानी, पियरे सगरे बादलों को
नीले आकाश में टाँक दूँ चकतियों की तरह और
कहूँ कि कपड़ों से तुम्हारा रूप झाँकता है पूरनवासी के चन्दा सा
आभास देता सुगोल सुपुष्ट निर्दोष गोलाभ का
मगर हो नहीं पाता कि पाता हूँ बादल हटे तो चन्दा वैसे ही रहे
पर कपड़े हटें तो लरज उठती है तरलता मात के नीर सी
आँसू ले बड़े रूप थन हो किलक उठते हैं
नल पर नहाती माँ उभर आती है आँखों में माँगती तौलिया
एकदम सहज सी अनावृत्त जैसे बछरू के संग गइया
कैसे वे भाव उकेरूँ? हो ही नहीं पाता।

उफ्फ उमस दहके प्रांतर धरा पर गलबहियाँ लूह की
दहकी साँसें अठखेलियाँ उन्मत्त उड़ती धूल सी
ऐसे में तुम नहीं जगाती कुछ भी ऐसा उद्दाम काम
कि जिसे लपेट कर कर सकूँ नग्न अक्षरों को शब्दभेद।
दुपहर की नींद सोती तकिया गीली स्वेद सीली
नींद गहरी हाँफती आ भागती जगाती दिदिया भोली
दुपट्टे की गाँठ में अमरुद, आम, पपीते सबसे अच्छे गाँव के
चल उठ्ठ खा ले, नहीं देख लेगी माई देगी गालियाँ बहुत।
अब क्या बताऊँ कि तुम्हारे दहकते चेहरे को देख
मुझे लगता है कि खोल दोगी आँचल वैसे ही फल झड़ेंगे
मैं कैसे लिखूँ कि जाना ऐसी भंगिमा के मायने हो सकते हैं और
कुछ फिल्मों को देखने के बाद। मुझमें अब भी वैसा नहीं होता
मैं कैसे कहूँ? हो ही नहीं पाता।

पुहुप खिले छतनार लाल गाल नीलम छाँई कहीं कहीं
आँखों के काजल काले छागल भागते छोड़ धवरी मइया
और रूपक और उपमा गढूँ कि विधाता की गढ़न हो फीकी
मैं कहूँ कविता सुरसरि सी अद्भुत अघाई लगती नीकी
हो नहीं पाता कि ध्यान आते हैं गुलमेंहदी सरीखे पौधे
नहीं तुम फूल नहीं, उन गहमर फलगुच्छों सी अदबद
छूते ही जिन्हें फट पड़ें सृष्टि के नियम अनेक
हो बारिशें कारे लघुआरे छोटे छोटे बीजों की
धसते अनेक मेरी बाहु में, वक्ष में, उरु और पेट में
भेदते कपड़ों को जो छिपाये लाज समेटते नीच।
तुम्हें देख मेरे भीतर रोज एक स्त्री जन्म लेती है
मैं कैसे लिखूँ? हो ही नहीं पाता।

जानो कि इस न उकेर पाने में, न लिख पाने में, न कह पाने में
न हो पाने में, ये जान पाने में, समझ पाने में, इतना सा कह पाने में      
वह सब कुछ हो पाता है, रहता है, रह जाता है हर पल
जो मुझे रख पाता है – एक पुरुष, पूर्ण पुरुष।
नहीं जानता कि तुममें कुछ हो पाता है या नहीं।
लेकिन इतना जानता हूँ कि तुम्हारे होने से मैं हूँ और मेरे होने से तुम।        

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

बादल रो!

बादल रो!
उद्धत यौवन आँच धरा, छुये पवन चल रही लू
सृजन भाव हिय में भरा, तप्त साँस ले रही भू।

बादल रो!
बीते युग बरस सरस के, वारि कामना रही शेष
दृग जल या मीठी झँकोर, नमी नहीं अब मीन मेख।

बादल रो!
उलझे राम मार्ग चयन में, रावण के शोध अभिषेक
अट्टहास हैं कंठ शुष्क, वारुणि वारि वृथा अतिरेक।

बादल रो!

मंगलवार, 19 जून 2012

वो अफसाना कहते हैं...



बाँचते हैं जो खबर भड़काना कहते हैं 
चुप रहते हैं वो समझाना कहते हैं 
वजह ढूँढ़ते हैं सचाई की मेरी आँखों में 
मुस्कुराते हैं फिर अफसाना कहते हैं।
***************
  1. The world is all that is the case.
  2. What is the case—a fact—is the existence of states of affairs.
  3. A logical picture of facts is a thought.
  4. A thought is a proposition with a sense.
  5. A proposition is a truth-function of elementary propositions.
  6. The general form of a truth-function is: [\bar p,\bar\xi, N(\bar\xi)]. This is the general form of a proposition.
  7. What we cannot speak about we must pass over in silence

गुरुवार, 24 मई 2012

बारह बरस!

 
... तो जब शाम होगी, थकन ढलान होगी
खोलूँगा वह पीला पड़ा कागज।
जिसे कहती थी तुम पहला प्रेमपत्र
जिसके नीचे लिखा अनाम सादर।
बारह बरस पुरानी स्कॉच
जिसकी रंगत समेट रहा होगा दुकान
बूढ़ा एक सूरज नशे से परेशान
हाथ हिला उसे करूँगा सलाम। 
ढोते बढ़ती उम्र के सामान
रोज थोड़ा थोड़ा खुश होने से है बेहतर
दुख की झिरझिरी लूँ समेट सह
खत पढ़ते हो लूँ तर
आँखों से सादर।
होठों के बादर
उमड़ें थर थर
थोड़ा लूँ बरस
बारह बरस!



सोमवार, 7 मई 2012

पावक



जम गये श्लेष्म कण साँस साँस, सकुचा प्राण स्थान वायु गति पड़ी मन्द 
हिचकियाँ करतीं रह रह आह्वान 
उमगो अग्नि देह में शमि घर्षण 
दौड़ो उद्धत बन जीवन धावक
हे पावक! 

प्रकृति तूलिका साक्षात रंग, रक्त पीत श्वेत आँच, आह जीवंत
आओ कि भीतर सजा है श्मशान 
जल उठे मृत माया करूँ तर्पण 
छुओ मुझे हर अंग द्रुत शावक 
हे पावक! 

आहुति है शेष, शेष है उमंग, वृथा सभी जो देह न दे अंत तक संग 
असमय क्यों पोतूँ भस्म ललाट 
अभी शेष है पूर्ण समर्पण 
मुक्त करो रोग से, हे पावक! 
हे पावक!!

रविवार, 15 अप्रैल 2012

खन खन सिक्कों जैसा।


मैं पंखों के रंग भरे कंटूर दिखाता रहा
वह पिजरे का दाम मोलाता रहा। 
सौदे के बाद बोला आप की बातें भी कविता होती हैं।

उस दिन से मैं अर्थ का अर्थ करने में लगा हूँ 
वह प्रसन्न है कि पाखी बोलता है - खन खन सिक्कों जैसा।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

कितना बड़ा??

जनवरी से लेकर दिसम्बर तक
छत और दीवारें मय तीन गुम्बद ज़िन्दा हैं।

12 बजे से लेकर 12 बजे तक ज़िन्दा हैं,
मसें भीगती जवानी से लेकर हँसिया हथौड़ा बुढ़ाई तक जिन्दा हैं,
विभाग की राजनीति से लेकर दीवार की क्रांति तक जिन्दा हैं,  
सँड़ास के वेग से प्रोस्टेट के संकोच तक जिन्दा हैं,
महीने के उन खास दिनों से लेकर निश्चिंत मुक्ति तक ज़िन्दा हैं।

मुझे आश्चर्य होता है कि बिखरी जीवन्तता अथाह
बहती है नालों में, बजबजाती है नालियों में -
फिर भी!
फिर भी!!
यह देश मरता क्यों जा रहा है?

कितना बड़ा मकबरा चाहिये -
इन जीवंत आत्माओं को दफनाने को क़यामत तक?
कितना बड़ा??

मंगलवार, 6 मार्च 2012

नाम..

नामपर नामसर नामचर नामखर 
नामभर नाममर नामोखर नामधर
नामखा नामपा नामआ नामजा
नामसा नामका नामभर नामकर
नामचा नामची नामसू नामभू
नामतू नामऊ नामफर नामतर
नामधा नामदान नाबदान नामपर  
नामकी नामड़ा नामजी नाममर 
नामगा नामरो नामपोछ नामदो 
नामधो नामगू नामधाम नामसो। 

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

न दिखा ऐसे में पीरो पयम्बर से जलवे

Crying Ukrainian child, 

Michael Muzyczka

 St. Sofia School

उतर गया उफक से सूरज उफ उफ करते
उमसा दिन बीता बाँचते चीखते अक्षर
लिखूँ क्या इस शाम को नज़्म कोई
जो दे दिल को सुकूँ और समा को आराम
चलता रहेगा खुदी का खुदमुख्तार चक्कर
चढ़े कभी उतरे, अजीयत धिक चीख धिक।

कालिखों की राह में दौड़ते नूर के टुकड़े
बहसियाने रंग बिरंगे चमकते बुझते
उनके साथ हूँ जो रुके टिमटिमाते सुनते
चिल्ल पों में फुसफुसाते आगे सरकते
गोया कि हैं अभिशप्त पीछे छूटने को
इनका काम बस आह भरना औ' सरकना।

हकीकत है कि मैं भी घबराता हूँ
छूट जाने से फिर फिर डर जाता हूँ
करूँ क्या जो नाकाफी बस अच्छे काम
करूँ क्या जो दिखती है रंगों में कालिख
करूँ क्या जो लगते हैं फलसफे नालिश -
बुतों, बुतशिकन, साकार, निराकार से
करूँ क्या जो नज़र जाती है रह रह भीतर -
मसाइल हैं बाहरी और सुलहें अन्दरूनी
करूँ क्या जो ख्वाहिशें जुम्बिशें अग़लात।


करूँ क्या कि उनके पास हैं सजायें- 
उन ग़ुनाहों की जो न हुये, न किये गये 
करूँ क्या जो लिख जाते हैं इलजाम- 
इसके पहले कि आब-ए-चश्म सूखें 
करूँ क्या जो खोयें शब्द चीखें अर्थ अपना
मेरी जुबाँ से बस उनके कान तक जाने में? 
करूँ क्या कि आशिक बदल देते हैं रोजनामचा- 
भूलता जाता हूँ रोज मैं नाम अपना।

सोचता रह गया कि उट्ठे गुनाह आली
रंग चमके बहसें हुईं बजी ताली पर ताली
पकने लगे तन्दूर-ए-जश्न दिलों के मुर्ग
मुझे बदबू लगे उन्हें खुशबू हवाली
धुयें निकलते हैं सुनहरी चिमनियों से
फुँक रहे मसवरे, प्रार्थनायें और सदायें।

रोज एक उतरता है दूसरा चढ़ता है
जाने ये तख्त शैतानी है या खुदाई 
उनके पास है आतिश-ए-इक़बाली
उनके पास है तेज रफ्तार गाड़ी
अपने पास अबस अश्फाक का पानी
चिरकुट पोंछ्ने को राहों से कालिख
जानूँ नहीं न जानने कि जुस्तजू
वे जो हैं वे हैं ज़िन्दा या मुर्दा
ग़ुम हूँ कि मेरे दामन में छिपे कहीं भीतर
ढेरो सामान बुझाने को पोंछने को    
न दिखा ऐसे में पीरो पयम्बर से जलवे
सनम! फनाई को हैं काफी बस ग़म काफिराना।


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शब्दार्थ: 
उफक - क्षितिज; समा - समय; अजीयत - यंत्रणा; बुतशिकन - मूर्तिभंजक; अग़लात - ग़लतियाँ; आली - भव्य, सखी; इक़बाल - सौभाग्य; अबस - व्यर्थ; अश्फाक - कृपा, अनुग्रह; फनाई- विनाश, भक्त का परमात्मा में लीन होना