कौन कहता है आसमाँ में नहीं होते सुराख
ग़ौर से देखिए हमने भी कुछ बनाए हैं ।
नज़र भटकती नहीं किनारों की महफिल पर
ज़ुनूँ का शौक तो मझधार की बलाएं हैं।
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स्पष्ट है कि पहली पंक्ति दुष्यंत से प्रेरित है। पहली दो पंक्तियों का संशोधन अमरेन्द्र जी ने किया है। अंतिम दो पंक्तियों को आचार्य जी ने पास कर दिया :) ;)
जाने क्यों न तो इनके पहले कुछ रचा जा रहा और न बाद में। जैसा है प्रस्तुत है।
जो दूसरों की हैं, कवितायें हैं। जो मेरी हैं, -वितायें हैं, '-' रिक्ति में 'स' लगे, 'क' लगे, कुछ और लगे या रिक्त ही रहे; चिन्ता नहीं। ... प्रवाह को शब्द भर दे देता हूँ।
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
आस्थावान
घर के बगल में
उग आया है -
विकास स्तम्भ ।
प्रगति के श्वान करने लगे हैं
उस पर 'शंका' निवृत्ति
और
'शंका' समाधान।
घर के आँगन में
तुलसी लगा
अब 'जल देने' लगा हूँ।
.. मैं पुन: आस्थावान हो गया हूँ।
उग आया है -
विकास स्तम्भ ।
प्रगति के श्वान करने लगे हैं
उस पर 'शंका' निवृत्ति
और
'शंका' समाधान।
घर के आँगन में
तुलसी लगा
अब 'जल देने' लगा हूँ।
.. मैं पुन: आस्थावान हो गया हूँ।
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
माता भूमि: पुत्रोऽहम्
आज अथर्ववेद के भूमि सूक्त (काण्ड १२, सूक्त १) से कुछ अंश। सम्पूर्ण बलाघात के साथ वेद पाठ सुनने का आनंद ही कुछ और है। सामने ग्रिफिथ का किया अंग्रेजी अनुवाद है लेकिन उससे हिन्दी अनुवाद करना अन्याय होगा। छान्दस मुझे आती नहीं, इसलिए मूल का आनन्द लें।
मैं अर्थ नहीं कर सकता लेकिन अनुभव कर सकता हूं।
सुनिये प्रारम्भिक अंश:
मैं अर्थ नहीं कर सकता लेकिन अनुभव कर सकता हूं।
सुनिये प्रारम्भिक अंश:
शब्दचिह्न :
अथर्ववेद,
पृथ्वी सूक्त,
भूमि सूक्त
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
...प्रेम को
हुए नयन बन्द
टपके मधु बिन्दु
अधर पर अधर
और मधुर
हंसी
लाज घूंघट
झांक गई भाग
दसन अधर
मन सन सन
हाथ बरज हाथ
न करो स्पर्श
काम कुम्भ
न
हाथ झिटको नहीं !
बस रखो वहीं
सुख सुख
गलबहियां क्या खूब !
छू रहीं अनछुओं को
तार रहीं
अस्पृश्य को
प्रेम को।
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
शुभा मुद्गल और आबिदा परवीन को सुनते हुए
'कामसूत्र' फिल्म में शुभा मुद्गल को सुनने के बाद आबिदा परवीन का गायन सुना।
... ओ ss मीयाँ sssss ...
लगा जैसे आबिदा 'ओम' कह रही हों और शुभा का तानपुरे पर सधा गूँजता स्वर उसके आगे जोड़ रहा हो... ईयाँ ssss
ओ ss मीयाँ sssss ...
गूँज ही थी ... सोचा एक प्रयोग करके देखते हैं और ... फिर दो अलग अलग वादकों पर दोनों एक साथ .. उल्लासमयी मत्त आबिदा परवीन और तानपुरे सी गूँज लिए गम्भीर शुभा मुद्गल... शमाँ बँधी पागल के खातिर ...
कुछ थाह सी... नहीं आभास सा लगने लगा .. उसका जिसने सनातन धर्म और इस्लाम दोनों को सूफियाने की राह दिखाई होगी... और फिर स्वर गंगा यमुना के बीच सरस्वती का नृत्य.... बहता चला गया..
(दोनो चित्र इंटरनेट सम्बन्धित साइटों से साभार)
नाच रही तुम आओ
दुसह दिगम्बर रमे कलन्दर
आज बनी यह धरा सितमगर
फिर भी नाचूँ नामे तुम पर
आओ, मैं नाच रही तुम आओ ।
साँस भरी जो लुढ़की पथ पर
तुम्हरी लौ ना बुझती जल कर
लपलप हिलती दहके मन भर
अपनी हथेली लगाओ
नाच रही मैं, आओ।
डूबी सिसकी अँसुवन अँगना
सजी सोहागन बाँधे कँगना
नेह नज़र भर आओ
नाच रही मैं, आओ।
साँस भरी जोबन ज्यूँ अगनी
तरपत रूह कारिख भै सजनी
बरसो बदरा, भोगी हो अवनी
पूरन पूर समाओ
नाच रही मैं, आओ।
जगा हुआ स्वप्न सा देख रहा हूँ... शुभा और आबिदा एक अकिंचन की भाव सरिता पर स्वर नैया खे रही हैं ..ॐ ... ओ ssss मीयाँ sssss ओम ... ईयाँ sssss
शब्दचिह्न :
आबिदा परवीन,
इस्लाम,
शुभा मुद्गल,
सनातन धर्म,
सूफी
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