शनिवार, 24 अप्रैल 2010

आस्थावान

घर के बगल में
उग आया है -
विकास स्तम्भ ।
प्रगति के श्वान करने लगे हैं
उस पर 'शंका' निवृत्ति
 और
'शंका' समाधान।
घर के आँगन में
तुलसी लगा
अब 'जल देने' लगा हूँ।
.. मैं पुन: आस्थावान हो गया हूँ।

13 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी किन्तु तीखे भाव की रचना बहुत पसन्द आयी गिरिजेश जी।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. आस्था ही त्राण दिला सकती है और अब मृत्यु ही मोक्ष है !

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  3. रीतिकाल/वीरगाथा काल से भक्ति काल में ट्रांजिशन?
    अच्छी रचना, प्रतीक सही बने हैं.

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  4. .
    .
    .
    घर के बगल में
    उग आया है -
    विकास स्तम्भ ।
    प्रगति के श्वान करने लगे हैं
    उस पर 'शंका' निवृत्ति
    और
    'शंका' समाधान।


    यह भी तो सोचिये कि
    कहीं प्रगति के श्वान
    भी हो चुकें हैं आस्थावान
    जिसे आप कह रहे हैं यहाँ
    'शंका'निवारण-समाधान
    वह उनकी ओर से भी
    विकास स्तंभ की नींव पर
    जल चढ़ाने का हो प्रयास!

    :) :)

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  5. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  6. बाहर का विकास कब तक सुख देगा । आस्था व अन्तर्मन बल पाये ।

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  7. वाह!! जबरदस्त... आस्था को और मजबूती मिले.. आमीन..

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  8. स्तम्भ पर शंका समाधान... बढ़िया है.

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  9. नास्तिकता की नींव पड़ चुकी थी...
    .. मैं पुन: आस्थावान हो गया हूँ।...

    इन दोनों सिरों के बीच...
    यह विकास का स्तम्भ खड़ा है...

    शंका असमाधान की स्थिति में...पुनः जड़ों को खंगालना...

    दिनेश जी के कहे पलायन और इसमें...
    बारीक सी लकीर खिंची है...

    विचारोत्तेजक कविता...

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  10. घर के आँगन में
    तुलसी लगा
    अब 'जल देने' लगा हूँ।
    .. मैं पुन: आस्थावान हो गया हूँ।

    वाह .....आपकी लेखनी को नमन .....!!

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