गुरुवार, 25 नवंबर 2010

डीहवारा की उपलब्धि से आगे...


डीहवारा की उपलब्धि से आगे ... 


नहीं रे! उपलब्धि की नहीं चाह मुझे
प्रेमतापस हूँ, भटकता रहा युगों से
उसे ढूँढ़ता जो मेरे जैसा हो और 
जिससे मैं अपनी बात कह सकूँ। 

तुम्हें देखा तो लगा जैसे सब पाया
चोट छील नहीं, वे सिर्फ मेरी बाते हैं 
जो मैंने की हैं - तुमसे जो अपने लगे।

तुम गढ़ा गए,उकेरा गए उन बातों से 
तो ज़रा पूछो अपने प्रस्तर अंत: से
प्रेमिका जो अब सामने आई है 
क्या वही नहीं जिसे तुमने चाहा था? 
जिसे सँजोए रखा इतने दिनों से 
आंधियां सहते
तूफान तोड़ते
मेघ रीते 
घाम जलते 
चन्द्र रमते! 

तुम्हारा तप सफल हुआ 
जैसे मुझ तापस का। 
जन्मों के पुण्यकर्म फलते हैं 
तब मिलते हैं दीवाने दो
तब दिखता है ऐसा कुछ। 

उत्सव मनाओ - 
तप नष्ट नहीं, यह सिद्धि है
हमारी उपलब्धि है,
जो मिल गई अनायास -   
प्रेम में ऐसे ही तो होता है।
नहीं, ऐसा लगता है
भटकते युग याद कहाँ रहते हैं! 

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

मौन कौन?

कवियों के गीत 
प्रियतम रूप। 
सराहोगी? 
मेरा मौन! 

धरा ने बुलाया
और सिमट गई।
पुकार पुकार 
थका आसमान
फिर बरस पड़ा। 
बोल सकता हूँ,
बरस नहीं सकता।
तुम कम से कम 
पूछ तो लेना - 
आया कौन?

काँच की खिड़कियाँ 
अब एकतरफा हैं
तुम आर पार देख सको 
मैं नहीं।
क्यों गीत गाऊँ? 
मैं स्वयं तो मधुर 
पर तुम्हारे लिए 
बस हिलते होठ 
मौन।

रेस्ट्रॉं में रश है 
कशमकश है। 
जिस टेबल पर 
तनहाई है
रात घिर आई है।
सर सर छुवन 
चटकी है अगन 
कपड़ों में।
बैठने पर 
न पूछा करो मुझसे -  
सिंथेटिक कौन? 

वह खिलखिल 
वह अदा 
हँसना बेबात 
सुबकना  
बिना बात। 
चुप रहा बहुत 
जब बोलने लगूँ 
वैसी ही रहना।
न न्यौतना - 
मौन।

रविवार, 21 नवंबर 2010

बात अकेली सी

बहुत हुए गुनाह बेखुदी में,अब क़यामत का आगाज़ हो
पढें अपनी अपनी हम तुम,जब शर्मनाक कोई बात हो।

शनिवार, 20 नवंबर 2010

पूजा

दीवार पर कील से टँगे भगवान 
ठीक नीचे खूँटी पर टँगा पसीना
धूप अगरबत्ती? 
नहीं रे, पूजा तो हो गई!
रोटी ठंडी हो रही है,
प्रसाद पा ले। 

रविवार, 14 नवंबर 2010

तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ? - 1

तुम जो आज आई हो
इस घर की देहरी लाँघ
वह देहरी जो ऊँची थी, बहुत ऊँची,
हमारे प्रेम से भी –
आज तुम्हारे स्वागत में झुकी है
ऐसी कि सगुन साटिका से अनुशासित
तुम्हारे रुन झुन कदम भी उसे लाँघने में सक्षम हैं।  
तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ?

कलंकिनी नहीं तुम अब, लक्ष्मी हो
जिसके संतति धन से
परम्परा के ब्याज चुकाए जाएँगे
और मूल मन में रह जाएँगे
चमकते सिक्कों से कुछ ऐसे धन –
छिप कर मिलना
हताश होना
साथ साथ मरने की कसमें
पिताओं के क्रोध
माताओं की घृणाएँ
ममता की बलाएँ
जमाने की थू थू।
अब जब कि धन धन में
सब धन्य हैं
तुम्हारे ऊपर कौन धन वारूँ?
तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ?  

तुम्हारे कदम जमीन पर न पड़ें
इसलिए माँ ने डलियाँ बिछाई हैं
दस्तूर नहीं, सचमुच हरसाई हैं।
मुक्त चलो मेरी प्रियतम!
भू से आँसुओं की कीच अब सूख चुकी है
हम मिल गए हैं
और कोई अनर्थ नहीं हुआ!  
नक्षत्र वही हैं
सुबह शाम वैसी ही होती हैं
बच्चे अब भी स्कूल जा रहे हैं
दो और तीन अभी भी पाँच हैं
सूरज चाँद अभी भी चमकते हैं
और  
चाँदनी सुहाग कक्ष की छत को भी नहलाएगी
ठीक वैसे ही जैसे पापी आलिंगन को नहलाती थी।
तो बताओ
इस संस्कार स्नान के बाद
तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ? (जारी)


चित्राभार: http://media.photobucket.com