शनिवार, 13 नवंबर 2010

बैठो मेरे पास



बैठो मेरे पास कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं,

गर पूछोगे तफसील तो कह दूँगा - मुझे कुछ नहीं पता।


बुधवार, 10 नवंबर 2010

तब तक प्रतीक्षा करो न!

तुम्हारे पत्र दिन में नहीं पढ़ता 
उजाले में आँखें चौंधियाती हैं 
और सूरजमुखी ऐंठने लगते हैं। 

तुम्हारे पत्र रात में नहीं पढ़ता 
रजनीगन्धा सी महक उठती है
यादों के साँप बाहर आने लगते हैं।

सच कहूँ तो आज तक उन्हें खोला बस है। 
'मेरे प्रियतम' और 'तुम्हारी तुम ही' 
पढ़ कर बन्द कर दिया है। 

बीच के अनपढ़े कोरेपन ने 
जाने कितनी ही कवितायें रचाई हैं। 
कहोगी तो पढ़ लूँगा -
जब दिन नहीं होगा
जब सूरजमुखी फूल नहीं खिलेंगे। 
जब रात नहीं होगी 
जब रातरानी नहीं फूलेगी।
जब 
साँप विलुप्त प्रजाति हो जाएँगे। 

तब तक प्रतीक्षा करो न! 
उत्तर तो देता हूँ न!
तुम भी नहीं पढ़ पाती हो क्या? 

रविवार, 7 नवंबर 2010

न सुर न ताल, बस मुक्तक

न सूर्य रचे न चन्द्र रचे 
रजनी के श्यामल वस्त्रों पर, उल्का के पैबन्द रचे ॥3/4॥
शब्द नहीं न अर्थ सही, अलंकार की कौन कहे
रोज रोज के घावों को, कविता में हम खूब सहे ॥1॥
आग जल रही हवन हो रहा, न देव दिखें न लेव दिखें
सामधुनों में रोदन उभरा, आँखें मलते उद्गीथ दिखे ॥2॥
हूँ हारा मन का मारा, पर साँसों में संगीत सजे
मज़दूरी के सिक्कों में जब, बाल हँसी की झाल बजे ॥3॥
आह तुम्हारा वाह तुम्हारा, हम मौनी मनमीत भले
कंठ भरे तब आ जाना, चुपचाप ढलेंगे साँझ तले ॥4॥
द्वार हमारे भीर जुटी है, टुकड़े टुकड़े शववस्त्र मिले
जीते जी नंगा ही रह गया, मरने पर क्या खूब सिले ॥5॥    
     

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

आत्मदीपो भव

आत्मदीपो भव!
अप्प दीपो भव!
अपने प्रकाश स्वयं बनो। 
अपनी रोशनी तुम्हें खुद तलाशनी होगी। 
Be your own torch bearer. 

चाहे जैसे कहो, लब्बो लुआब ये कि करना खुद को ही है। 
तो आज दिया बन कितना जलने का प्रोग्राम है? 

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

आज के दिन कोई रोता है भला?

जल ले मन दीपक सुघर, बाती नहीं न तेल सजल, जल ले मन अँजोर जोर। 
कब था सब शुभ धवल, कब थे नहीं काले जलद, न बुझ, जल मन मनजोर।
गोधूलि होंगी राहें विकल, चाह होगी पर धीर बरज, लहक टपकी आँख कोर।
जल ले मन अँजोर जोर मनजोर टपकी आँख कोर।

भूख बैठी डार पर 
घुघ्घू चले शृंगार पर 
लक्ष्मी लुटे लौंजार पर। 
क्या हुआ जो छ्न्द टूटे 
क्या हुआ जो बन्द फूटे 
तुम जमे रहो जेवनार पर 
शान पट्टी मार कर। 

खाँसता जो गीत किसका मीत
निचोड़ ले हर बूँद ऐसी प्रीत 
यह जीना चबेना माल पर 
जो मैल बदबू हर साँस पर 
चढ़ गई ज़िन्दगी शान पर 
तुम जमे रहो जेवनार पर 
टँगे रहो निस्तार पर। 

करूँ क्या मौसम तो आएँगे ही, हँस लूँ, एक दिन फुलझड़ी छोड़ लूँ 
आरती सजा पूज लूँ उल्लुओं की मात को।
हाँ रहेंगे हमेशा मैल बदबू 
खाँसते गीत होंगे शान पट्टी निस्तार पर 
नाचता दलिद्दर होगा हमारी ताल पर 
साल भर, 
दीपावली तो फिर भी आएगी ही 
मना लूँ।
न कहो
जल ले मन अँजोर जोर मनजोर टपकी आँख कोर।
आज के दिन कोई रोता है भला?