शुक्रवार, 11 जून 2010

फुटबाल विश्वकप का थीम गीत

सोमालिया में जन्मे कनाडाई नागरिक क'नान का गीत 'वेविङ फ्लैग Wavin' Flag' फीफा विश्वकप 2010 का थीम गीत है। खेल की उत्सवधर्मिता को व्यक्त करने के लिए इस गीत की रीमिक्सिंग की गई है। इस गीत के ऑडियो वीडियो को सुनना देखना अपने आप में एक अलग अनुभव है। इंटरनेट पर गीत उपलब्ध है।
आइए इस गीत से आप का परिचय करा दूँ। क़्वींस इंग्लिश के अभ्यस्त अपने देश वालों को यह गीत अव्यवस्थित लग सकता है लेकिन इसके 'बिखराव' में अफ्रीका से लेकर कनाडा तक फैले अंग्रेजी के कई संस्करणों का मिश्रण है। खेल तो ऐसे ही सम्मिलन और मेल जोल के लिए होते हैं !
मूल और भावानुवाद  प्रस्तुत कर रहा हूँ:
Ooooooh Wooooooh
Give me freedom, give me fire, give me reason, take me higher
See the champions, take the field now, you define us, make us feel proud
In the streets are, exaliftin , as we lose our inhabition,
Celebration its around us, every nation, all around us
Singin forever young, singin songs underneath that sun
Lets rejoice in the beautiful game.
And together at the end of the day.
WE ALL SAY
When I get older I will be stronger
They'll call me freedom Just like a wavin' flag
And then it goes back
And then it goes back
And then it goes back
When I get older I will be stronger
They'll call me freedom
Just like a wavin' flag
And then it goes back
And then it goes back
And then it goes
Oooooooooooooh woooooooooohh hohoho
Give you freedom, give you fire, give you reason, take you higher
See the champions, take the field now, you define us, make us feel proud
In the streets are, exaliftin, every loser in ambition,
Celebration, its around us, every nations, all around us
Singin forever young, singin songs underneath that sun
Lets rejoice in the beautiful game.
And together at the end of the day.
वू ssss वो ssss हो sss! 

आज़ादी मुझे दो, 

भर दो आग सीने में
 मक़सद दो
ले चलो मुझे ऊँचे
देखो उन योद्धाओं को
दौड़ो खुले मैदान में अब
मक़सद दो जो नाज़ हो हमें।
भर दें हम गलियों को
तोड़ कर मन के सारे बन्धन
उत्सव है हमारे चारो ओर
सारा संसार हमें घेरे है
उत्सव है चारो ओर।

गाते रहें हमेशा जवाँ
सूरज के नीचे गूँजे गीत
सुन्दर खेल का आनन्द लें हम
और जब दिन का हो अंत
हम सब कहें:

"मैं जब सयाना हूँगा
आएगी और अधिक शक्ति
लहराते झंडे की तरह
वे मुझे आज़ाद कहेंगे"

और फिर सब मुड़ कर कहें 
और फिर सब मुड़ कर कहें 
और कहते रहें:

वू ssss वो ssss हो sss

आज़ादी तुम्हें  दें,

भर दें आग सीने में
मक़सद दे कर 
ले चलें तुम्हें ऊँचे
देखो उन योद्धाओं को
दौड़ो खुले मैदान में अब
तुम हमें मक़सद दो
जो नाज़ हो हमें।
उमंगों के हारे अब
भर दें गलियों को
तोड़ कर मन के सारे बन्धन
उत्सव है हमारे चारो ओर
सारा संसार हमें घेरे है
उत्सव है चारो ओर।

गाते रहें हमेशा जवाँ
सूरज के नीचे गूँजे गीत
सुन्दर खेल का आनन्द लें हम
दिन के अंत तक साथ साथ  
साथ साथ ।

बुधवार, 9 जून 2010

आओ प्रिये !

अब जब कि मैं लिखना चाहता हूँ
ढेर सारा
अनुभूतियाँ हैं ढेर सारी
और शब्द स्रोत सूख गए हैं  -
तुम्हारी प्रतीक्षा है।

तुम जो बैठी रहती थी
ठीक पीछे स्क्रीन को ताकती
झूलते रहते थे तुम्हारे अलक
की बोर्ड पर
और कानों को घेरती वह साँसे !
साँसों और शब्दों की केमिस्ट्री
अभिव्यक्ति के कितने समीकरण
सजा जाती थी !
शब्दों के खुलते थे नए अर्थ
सहारा लिए तुम्हारी देह के
बदलते दबावों के साथ ।

कितनी ही बार
जब टपके आँसू
की बोर्ड पर !
न सोचा कभी
तुम्हारे या मेरे ?
मैं चकित हुआ
गंगा यमुना के संगम पर
और सरस्वती बहती रही ।

एक त्रासदी
जारी रही
मैं कागज पर नहीं लिख पाता
मस्तिष्क के जाने किस कोने
कुछ अघटित हुआ कभी
अंगुलियों से निकसे शब्द
हो गए मुड़े तुड़े अक्षर
(उनका ब्रह्मत्व लुप्त )
मात्राएँ सवार व्यञ्जनों पर
कुरूपता के प्रतिमान स्थापित करते -
मुझे याद नहीं रहा
आखिरी बार कब सुन्दर लिखा था !

याद रहता भी क्यों ?
आवश्यकता भी क्या थी ?
तुम थी
की बोर्ड पर झूलते अलक
कानों के पास टहलती साँसें
देह का देह पर टहलता दबाव
टपकते आँसू
तो कभी मुस्कान से
बदलती साँसों की लय -
हाँ, मैं था -
देहधर्मी कवि ।
जो कुछ रचता था
उनमें न थे :
उदात्तता
आलोचक प्रिय सौन्दर्य
गरिमा
क्रोध
प्रेम
घृणा ...
बस तुम थी
तुम्हारी गढ़न
व्यवस्थित अक्षर अक्षर
मेरी हर अभिव्यक्ति
ढल जाती थी
अद्भुत शिल्पकारी में !
लोग कहते थे
क्या खूब रचता है !

आज तुम नहीं हो
साँस, आँसू, दबाव, मुस्कान ...
सब विलुप्त
खो गई है ऊष्मा
किस गर्भ से
कैसे कोई अंकुर फूटे ?
धरती नहीं होती बन्ध्या कभी
यह ज्ञान हुआ है कि
ऊष्मा न हो तो कुछ नहीं ।
ढेर सारा यूँ होता है
कुछ नहीं
कुछ भी नहीं -

आओ ! फिर से आओ!!
की बोर्ड की टक टक को
जीवन दो
स्वर दो
ऊष्मा दो
आँसू दो
स्मित दो
घेर लो एक बार फिर
ऊष्ण साँसों की गन्ध से !
मैं रचना चाहता हूँ।
थकान से मुक्त होना चाहता हूँ।
आओ प्रिये !

रविवार, 6 जून 2010

लघु गीत

बादर साज नयन रहे कोरे 
उड़ रही धूर मलय संग भोरे

उमस की कोठ सजन लिए ओट 
पेम के नेम तजत रहे सो रे
उड़ रही धूर मलय संग भोरे । 

ऋतु बदल रही ऋतु अखर गई
सेज दुखी नहिं ताँतन तोरे** 
बादर साज नयन रहे कोरे। 
 
** प्रणय केलि के समय खाट के तंतुओं की चरमराहट  

शुक्रवार, 4 जून 2010

गंध

साँझ आम सड़क सिगरेट
अचानक तुम ?
धुआँ गुबार दफन भीतर
लरजते आँसू रोक
तुम्हारी देह गंध
हवा में जोहता रहा
तुम दूर
बिना मुड़ कर देखे
(कहा नहीं जा रहा)
यूँ चली गई !
बस देखता रहा
कारे केश -
आग बुझी राख गिरी
कड़वाहट उतराई
याद आया वह दिन
जब पी थी
पहली सिगरेट ।

हूँ दीवाना
अकेले में अंगुलियों के पोर जोड़
होठों पर रखता हूँ
वह ...तुम्हारे अधरों का स्पर्श
कहां ?
कितनी दफे वर्कशॉप  जाते
अपनी खाकी को भिगो
सूँघा है
कि गंध मिल जाय तुम्हारी
कहाँ... वह ऊष्मा कहाँ !
दिन की जीवन लहरियां
अब काठ हैं - तुम जो नहीं हो
जिन्दगी अब गन्धहीन है...
मेरे कमरे के बाहर
रातरानी सूख चली है -
माली कहता है
अब की गरमी
क्या लू चली है
यूं ही भटकता हूँ
साँझ आम सड़क सिगरेट ।
... सिगरेट सिगरेट
छल्ले धुआँ धुआँ...

बुधवार, 2 जून 2010

न रो बेटी

न रो बेटी
माँ की डाँट पर न रो ।

वह चाहती है कि
वयस्क हो कर तुम
उस जैसी नारी नहीं
अपने पापा जैसी 'मनुष्य' बनो
(उसे मनुष्य और नारी के फर्क की समझ है) ।

लेकिन उसकी यह भी कामना है:
कि सहलाएँगे तुम्हारे बोल
कराहते तुम्हारे सहचर को।
अपने बच्चे को तुम लोरी सुना कर सुलाओगी।
ज्वर से तपते मस्तकों पर
झरते तुम्हारे आँसू ताप हरेंगे ।

वह धरा पर आदि नारी की प्रतिनिधि है।

संक्षेप में कहूँ तो
उसे डर है
(आदिम है कि नहीं? नहीं पता)
कहीं
मनुष्य होने की प्रक्रिया में
तुम्हारे भीतर की नारी न समाप्त हो जाय !

तुम्हारे आँचल में वह दूध
और आँखों में पानी भी चाहती है -
ये न रहे तो मनुष्यता कैसे जीवित रह पाएगी?
अपने डर का तनाव
वह तुम तक पहुँचाती है
डाँटती है
न रो बेटी ।

माँ समझती है
समझाती है
कि
यात्रा लम्बी और कष्टकारी है,
मनुष्य और नारी के बीच भारी है
नासमझी -

जाने तुम कैसे डाँटोगी
अपनी बेटी को ?
क्या उसकी आवश्यकता भी होगी ?

तुम्हारे मनुष्य
(नर का पर्यायवाची)
पापा
इन प्रश्नों से ही जूझते रहते हैं।
चुप रहते हैं
तुम्हें दुलराते रहते हैं ।
सच यह है कि
प्रश्नों के आगे
अपनी विवशता
को भुलवाते हैं।

प्यार भुलवना भी होता है बेटी !
न रो
माँ की डाँट पर न रो !