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शुक्रवार, 4 जून 2010

गंध

साँझ आम सड़क सिगरेट
अचानक तुम ?
धुआँ गुबार दफन भीतर
लरजते आँसू रोक
तुम्हारी देह गंध
हवा में जोहता रहा
तुम दूर
बिना मुड़ कर देखे
(कहा नहीं जा रहा)
यूँ चली गई !
बस देखता रहा
कारे केश -
आग बुझी राख गिरी
कड़वाहट उतराई
याद आया वह दिन
जब पी थी
पहली सिगरेट ।

हूँ दीवाना
अकेले में अंगुलियों के पोर जोड़
होठों पर रखता हूँ
वह ...तुम्हारे अधरों का स्पर्श
कहां ?
कितनी दफे वर्कशॉप  जाते
अपनी खाकी को भिगो
सूँघा है
कि गंध मिल जाय तुम्हारी
कहाँ... वह ऊष्मा कहाँ !
दिन की जीवन लहरियां
अब काठ हैं - तुम जो नहीं हो
जिन्दगी अब गन्धहीन है...
मेरे कमरे के बाहर
रातरानी सूख चली है -
माली कहता है
अब की गरमी
क्या लू चली है
यूं ही भटकता हूँ
साँझ आम सड़क सिगरेट ।
... सिगरेट सिगरेट
छल्ले धुआँ धुआँ...