शनिवार, 26 दिसंबर 2009

कविता के लिए

टूटें छन्द बन्ध
मुक्त भाव
अक्षर सम्बन्ध
बस निबह जाय।
बात हो जाय
कह लें सुन लें
और मन बह ले।
... 
व्याकरण पहेरू
बाहर ही ठीक।
घरनी कविता
डपट दे पहेरू को
इतनी तेजस्विनी
मानवती तो हो !
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छ्न्द मानव जाति के जीवन से ही आते हैं। मुझे सॉनेट लिखने को कहो तो बगले झाँकने लगूँ, दोहा या घनाक्षरी कहो तो शायद कर जाऊँ। बहुतेरे ऐसे हैं कि वह भी न कर पाएँ लेकिन मन की बात कह सकें और आप को द्रवित कर सकें, सोचने पर मजबूर कर सकें या नाचने, वाह वाह करने को उकसा सकें तो कवि हैं ...
ग़जल मुझे नहीं आती। कोई छन्द नहीं आते। मैं लय को थोड़ा समझता हूँ। बस। अब आप व्याकरण सम्मत रचना चाहते हैं तो पहेरू का गुलाम बनना पड़ेगा। अब आप के उपर है - स्वामी रहना चाहते हैं, कविता को स्वामिनी बनाना चाहते हैं कि पहेरू के हाथ घर की चाभी देना चाहते हैं ! ..
मुक्त रचिए - गजलगोई का शौक है तो उसकी लय में रचिए। बस लय पर दृष्टि रखिए, जिस दिन सध गई उस दिन बल्ले बल्ले... आहा चिकनाक चिकनाक... लोग झूमेंगे नाचेंगे और रोएँगे सोचेंगे.. कोई यह पूछने नहीं आएगा कि बहर किस शहर गया या इसमें का मतला ठिगना है..

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

तपस्या

मेरे आत्मन् !
फीड नहीं लिया
ई मेल सब्सक्राइव नहीं किया
एग्रीगेटर नहीं देखता हूँ।
मुझे याद है तुम्हारे ब्लॉग का पता -
एक्सप्लोरर पर टाइप कर देखता हूँ।

मोबाइल का नेट
बहुत है धीमा।
किसी ने कहा
ऑफलाइन ऑप्सन प्रयोग करो
दुबारा जल्दी खुलेगा -
उन्हें क्या मालूम
तुम्हारे नए अक्षरों का धीमे धीमे उतरना
ऑनलाइन
कितना रोमाञ्चकारी लगता है !

बार बार कटते जुड़ते कनेक्शन में
होती टिप्पणियों का गुमना
कटना, दुबारा हो जाना -
मेरे आत्मन्
तुम क्या जानो ?
इस तपस्या में हमने जो पाया है!

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

इंटीग्रेसन की किताब

जब मन था हैराँ, किसी के यूँ ही चले जाने से
जब मन था हैराँ, 'मित्र' के 'किसी' हो जाने से
मेरे मित्र मैंने तुम्हें लिखने को कहा , कागज मेरा था।
कुछ न पूछा तुमने और बस रच गए !
एक तुम हो और एक वह थे - दोनों अपने !!
आज 'हैं' को 'थे' कहते कलेजा मुँह को आता है ।

सोचता हूँ कि एक खत लिखूँ तुम दोनों को
लिखावट हो बस - !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
विस्मयादिबोधक चिह्न - अविश्वास से भरे हुए।
दोनों खतों के इन चिह्न अर्थों में होगा कितना अंतर ! (एक और विस्मय !)
विस्मय में भी कितना अंतर !
शब्द निरर्थक हो चले थे, आज चिह्न भी हो गए !
यूँ दुअर्थी या बहुअर्थी हो जाना निरर्थक ही तो होता है।

जब सोचता हूँ कि अनिश्चय की उस बहस बेला से -
समझ ले तुम कितनी समझ रच गए, तो होता हूँ हैराँ
क्या निकटता की ऊष्मा दूर ही अच्छी होती है ?
साँसों के जीवन में सृष्टि ने दुर्गन्ध क्यों घोली?
क्या यह इंगित कराने को कि दूरी रहनी ही चाहिए ?
अधिक निकटता हमें एक दूसरे से दूर ही करती है
हम जान जाते हैं जो एक दूसरे की सीमाएँ !  
तुम्हारी भाषा में कहूँ तो योग के लिए सीमाएँ आवश्यक हैं
जब सीमाएँ होंगीं तो उनमें निम्न सीमा तो रहेगी ही
तुम उस उच्च सीमा को साधने को निम्न बन गए - सहर्ष !
तुमने दूरी को माप दे दिया - मेरे नाम के कागज पर रच कर।
इस माप को मैंने अपने औजारबक्से में रख लिया है
इसके दोनों छोरों पर मेरी सीमाएँ हैं।

मैं तुम दोनों का कृतज्ञ हूँ
उसने नहीं रचा मेरे कागज पर - उच्च सीमा।
तुमने रचा मेरे कागज पर - निम्न सीमा।

आज बहुत वर्षों के बाद मैंने अपनी इंटीग्रेसन की किताब खोली है ।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

सियाही सियाही..


मन के उजले पर छिटकी है आज वक्त की सियाही
दु:ख के अक्षर बरसने लगे हैं
घर की छत का पनाला सियाही सियाही ।
उठता हूँ कि रोके है पलंग की चिर चिर
अलसाया है आलम ये वक्त,  धरा है उनींदा,  चिर चिर।
मत बातें करो चलने की
कि वक्त ठहरा ही रहा है, आज भी ठहरी हैं यादें
कोई पूछे है कि हुआ सब कैसे जाया
यूँ जाया । बिलाया। अलहदा सा सौदा ।
मैं कहता हूँ न पूछो कि जख्म रिसने लगे हैं।
वो: जज्बा-ए-बदला कि सँवार देंगे सब कुछ
पोंछ देंगे हर आँसू
खिलेंगे अनारदाने हर होठ की लाली
हर पालने में होगा एक खिलौना सा सपना
कि ज़िन्दगी होगी बस बरक्कत
न होगी जीने की फितरत मसक्कत -
सब हुए आज हैं अलहदा सा सौदा ।
मत बातें करो आज चलने की
दु:ख के अक्षर बरसने लगे हैं
सड़क है गढ़ही सियाही सियाही।
जिन को ले मशालें
जलानी थीं वो चौपालें जहाँ कटती हैं खालें
ज़िबह होते आदमी की जिन्दा मिसालें
वो: यूँ जा रहे हैं गो कि बस्ती है विराँ
उनके कानों टंगी है मोबाइल सियाही
सुनेंगे क्या वो मिसालें गवाही कि हाले तबाही ?
षड़यंत्र है ये आलिमों के जालिमों के
बैठे हैं वो तख्ते सियाही
लिए दामन उजले सियाही सियाही।
हाइवे पर उड़ता परिन्दा है भरमा
दरख्तों के साये बहकते सिसकते
हवाओं के झोंके अन्धे रेतीले
आँखों में तिलस्म भरते, सय्याद ये देखो सँवरते बने हैं।
जाल के भीतर उड़े हैं परिन्दे
ग़जब है बरक्कत कि जिन्दगी की मसक्कत
हो गई है ओझल। आहें फिजाँ में चहकने लगी हैं।
न पूछो कि हैराँ हूँ देखा किए हूँ तिलस्मे सियाही।
वो बाहों की मछलियाँ वो नजरों की तकलियाँ
वो जहीन चश्मे वाले वो टाई की गाँठें
वो छरहरे जिश्म वो दिमागों में इल्म -
बेकार बिला वजह सब बैठे हैं ठाले
चलेंगे भगेंगे कि क्षितिज पे सियाही
थकेंगे, फँसेंगे फेमिली बच्चे औ' रोजी
किसी दिन ऐसे ही बैठेंगे सोचेंगे कि
घर का पनाला उगले है सियाही।
देर हो रहेगी तब तक , ऐसे चलेगा कब तक
मैं सोचे हूँ- मेरे सामने है सियाह बोलेरो
उतरे हैं वो: उजले आलिम जालिम सियाही
दु:ख भग गया है दाँत निपोरे मैं हाथों को जोड़े
खड़ा हूँ - हे हे। मेरे पीछे है छुप गई सियाही सियाही।
सब ठीक है आओ बैठो मेरे कसाई सियाही -
जिबह के सामाँ छिटकने लगे हैं - खुशियाँ ही खुशियाँ।

मन के उजले पर छिटकी है आज वक्त की सियाही
दु:ख के अक्षर बरसने लगे हैं
घर की छत का पनाला सियाही सियाही ।


गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

साँवली !

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गए सप्ताह एक जूनियर महिला सहकर्मी ने सिविल इंजीनियरिंग की कुछ पुस्तकें माँगी। उनके पति को किसी परीक्षा के लिए चाहिए थीं। पढ़ाकू छवि होने से लोग निश्चित से रहते हैं कि मैंने कबाड़ सँजो कर रखा ही होगा। जाने कितनी पुस्तकों से मैं हाथ धो चुका हूँ  - भुलक्कड़ स्वभाव और लेने वाले तो मंगन जाति दोष के कारण भुलक्कड़ हो ही जाते हैं :) .. 
खैर पुस्तकें मेरे पास थीं, दे दीं। लेकिन चूँकि महिला के हाथ जानी थीं, इसलिए जाँच पड़ताल आवश्यक थी। असल में पढ़ाई के दौरान मेरी आदत थी कि कोई चित्र, कविता वगैरह अच्छी लगने पर उसे अखबार से काट कर पुस्तक के प्रारम्भ में चिपका देता था। राजीव ओझा जी के 'पढ़ै फारसी बेंचे तेल' वाले जुमले पर फिट होने वाला रूमानी स्वभाव ! बहुत बार ऐसे चित्र कलात्मक होते हुए भी 'संस्कारी' लोगों को धक्का पहुँचाने की योग्यता रखते थे।  ..जाँच पड़ताल में ही यह चित्र और उसके नीचे पेंसिल से रची कविता दिख गई। मैंने उस पृष्ठ को फाड़ लिया। आज स्कैन कर पोस्ट कर रहा हूँ ... चित्र सम्भवत: कैलेण्डर चित्रकारी पर किसी अखबारी रिपोर्ट में से लिया गया था।
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