मेरे आत्मन् !
फीड नहीं लिया
ई मेल सब्सक्राइव नहीं किया
एग्रीगेटर नहीं देखता हूँ।
मुझे याद है तुम्हारे ब्लॉग का पता -
एक्सप्लोरर पर टाइप कर देखता हूँ।
मोबाइल का नेट
बहुत है धीमा।
किसी ने कहा
ऑफलाइन ऑप्सन प्रयोग करो
दुबारा जल्दी खुलेगा -
उन्हें क्या मालूम
तुम्हारे नए अक्षरों का धीमे धीमे उतरना
ऑनलाइन
कितना रोमाञ्चकारी लगता है !
बार बार कटते जुड़ते कनेक्शन में
होती टिप्पणियों का गुमना
कटना, दुबारा हो जाना -
मेरे आत्मन्
तुम क्या जानो ?
इस तपस्या में हमने जो पाया है!