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शनिवार, 8 मई 2010

रैना दी ने ठोंक सुलाया ।

बारिश अम्मा ने नहलाया
दिन हुआ दिगम्बर धुला धुला
जागे लोगों के कपड़े पहने
 सूरज संग स्कूल चला।

हँसी ठिठोली बाँह मरोड़ी
आसमान सूरज चढ़ धाया
कुट्टी कर ली दिन गुस्साया
छाँह किताबें पटक चला।

सूरज झाँके दिन भी ताके
हवा लाल के बँटे बतासे
भर भर पेट दिन ने खाया
हँसा, सूरज को कुढ़ता पाया।

ढली दुपहरी सूरज उतरा
पेंड़ फुनगियाँ फलती अमियाँ  
यारी जुड़ गइ कुट्टी तोड़ी
दोनों ने जब खट्टी पाया।

थके पाँव कपड़े हैं मैले
छाँह किताबें लाद आ गए
संझा दादी की झिड़क सुनी
रैना दी ने ठोंक सुलाया ।