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मंगलवार, 4 मई 2010

एक प्रश्न

आज कल एक प्रश्न बहुत सता रहा है - पुरुष शरीर पर उतनी कविताएँ क्यों नही हैं जितनी नारी शरीर पर ? 
तुलसी टाइप नहीं ..ऐसी जो 
बबूल के काँटों का राग रचें, 
बाहु मांसपेशियों में मचलती मछलियों की रवानी के छ्न्द गढें,
मुक्त अट्टाहस में गूँजते प्रलय रव को सुनें सुनाएँ,
वक्ष की रोमावलियों पर कोमलता को सँभालती रुक्षता को पखावज नाद दें
 .. क्यों नहीं हैं? 


मैं पुरुष शरीर पर ऐसा कुछ रचना चाहता हूँ:
शत घूर्णावर्त तरंग भंग उठते पहाड़ 
जल राशि राशि पर चढ़ता खाता पछाड़ 
तोड़ता बन्ध प्रतिसंध धरा हो स्फीत वक्ष 
दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष  (निराला, राम की शक्ति पूजा) 


जाने कब हो पाएगा ?
दिनकर ! तुम्हारी उर्वशी के छ्न्द कब इस आकाश में उतरेंगे?