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गुरुवार, 13 मई 2010

धुत्त ! ऐसे ही।

प्रात समय
किरणें झूमें गली गली
हरसिंगार झर झर झर झर
बन्द आँखें तुलसी के बिरवा
खुले केश छू लूँ?
धुत्त !
सुनो कुकर की सीटी
..गैस धीमी कर दो।

साँझ हुई
कर्मठ बिजली बिखेरे
चाँदी सोना गली गली
आँचल ढका मस्तक
लौ लगाती दीप बाती
लाइट बुझा दूँ  ?
धुत्त !
देवता द्वार से लौट जाएँगे।