अनजाने ही छ्न्द गढ़ गये चर्चा मीठी मीठी
बहा पसीना रोटी भीगी तपती रही अंगीठी।
जोर हाथ के बेलन घूमे चौकी खटपट सीखी
ताल दे रही चूड़ी खनखन जिह्वा नाचे भूखी।
चटनी चटक दाल है सरपट महक मधुर तरकारी
उड़ती भाप भात को साजे अंगुलियाँ सहकारी।
भाग गया बाबा का गुस्सा आये निपट अनूठे
आग पेट की केवल सच्ची और भाव सब झूठे।
