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रविवार, 7 मार्च 2010

गाली

तुम बोले
मैं बोला
तुमने देखा
मैंने देखा
तुम चले भी
तो मैं दौड़ा -
पता नहीं
जाने कब
तुम सोचने लगे
कि मैं हूँ ही नहीं।

उस दिन जब तुमने
रेत में सिर छिपाया था
मैंने भी सिर झुकाया था
रेत की ओर तुम्हारे साथ।
जाने क्यों
जो देखा था
वह चुभने सा लगा था आँखों में
तुम सिर गाड़े पड़े रहे
और मैं
आँख फाड़े
निकालता रहा
रेत के कण - कण दर कण
.. जो अन्धेरा सामने था
और उजला होता गया
क्षण दर क्षण ..

अन्धेरा तुम्हारे साथ था
रेत में आँख जो मूँदे थे
अन्धेरा मेरे साथ था
आँख जो खोले था मैं ...

अब जब कि तुम
रेत में सिर गाड़े
अपने पैरों को पटक
यह जता रहे हो
कि मैं वंचक हूँ ..
ठीक उसी समय
मैं चिल्ला रहा हूँ ...
"देखते रहो
अन्धेरा घना है"
ठीक इसी समय
तुम खोज रहे हो
अपने मन-शब्दकोष में
मेरे योग्य कोई
सुसंस्कृत परिष्कृत
जटिल अबूझ सी -
गाली
।