मेरे कानों में तुमने कभी फुरफुरी नहीं की
मेरे सिर से
वो जुएँ जो थे ही नहीं,
तुमने नहीं निकाले।
कभी तुम्हारी चोटी पकड़ नहीं खींचा
और न संग संग अमिया खाए।
मेरी अनाम दीदी!
बरसों बाद आज
तुम्हें याद किया है।
पुराने रिश्तों की चुभन का मौसम है
दीदी, तुम्हें याद किया है।
सरकारी स्वास्थ्यकेन्द्र पर
वह हमारा मिलना पहली बार!
मुझे लिपटा लिया तुमने अचानक
सब हुए थे हक्का बक्का।
सिर को चूमने के बाद
सीने पर क्रॉस बनाने के बाद
पर्स से निकाल सबको तुमने एक फोटो दिखाई थी -
मेरा थॉमस है
देखो! बिल्कुल ऐसा ही है।
सबको अचरज हुआ था।
और बढ़ता गया तुम्हारा बहनापा
टिफिन के समय मैं भाग कर आता
चट करता तुम्हारी बनाई कुकीज
और अनाम व्यञ्जन।
चुपचाप तुम निहारती रहती
फिर धीरे से आँखें पोंछ कर कहती
"आज श्रीकांत बहुत अच्छा खेला।
तुमने सुना क्या?"
मैं मुँह खोलता और गावस्कर की बात करता।
तुम गुस्सा हो जाती
और मैं भागता कपिलदेव की गेंद सा।
यूँ ही दिन उड़ गए
केरल का परवाना तुम्हारे हाथों में था
उस दिन तुम बहुत खुश थी
तुम्हारे जाने की बात पर जब मैं चुप हुआ था
तुमने मेरी कलाई पर क्रॉस बनाया
"देखो, इसमें दो लाइने हैं
एक थॉमस है और एक तुम।
बस ऐसे ही याद कर लिया करना
याद करने को बहाने आ ही जाते हैं।"
मैं भूलता चला गया।
कभी कभार खबर मिलती
कि तुमने मेरा हाल पुछवाया है
लेकिन मैंने कभी तुम्हें सन्देश नहीं भेजा।
इंजीनियरिंग में चयन के हफ्ते भर में
तुम्हारी खुशी, तुम्हारी शुभकामना का
सन्देशा आया था -
बस वह आखिरी था।
आज वर्षों बाद तुम क्यों याद आई?
अनाम दीदी!
तुम्हारा नाम तक याद नहीं रहा
कहीं ग्लानि है, गहरी सी ।
आज समझ में आया है -
तुम्हारे जाने के बाद
क्रिकेट कमेंट्री सुनना मैंने क्यों छोड़ा था ?
आज तुम्हारे बारे में लिखते
न छ्न्द हैं, न शिल्प है, न शब्द हैं
अलंकार, बिम्ब, प्रतीक कुछ नहीं
सपाटबयानी है।
पर मेरे लिए यह कविता है-
अनाम।
कहीं क्षीण सी आस है
शायद तुम इसे पढ़ पाओ -
केरल में हिन्दी साइट?
तुम इंटरनेट पर आती भी हो?
सवाल बेमानी हैं
मुझे चमत्कार की प्रतीक्षा है।
आज पहली बार
पहली बार
मैंने कलाई पर क्रॉस बनाया है।