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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

आ रही होली - पुनर्प्रस्तुति


सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली

आ रही होली।

पुरा' बसन उतार दी
फुनगियाँ उगने लगीं
शोख हो गई, न भोली
धरा गा रही होली।

रस भरे अँग अंग अंगना
हरसाय सहला पवन सजना 
भर भर उछाह उठन ओढ़ी 
सजी धानी छींट चोली। 

शहर गाँव चौरा' तिराहे
लोग बेशरम बाग बउराए
साजते लकड़ी की डोली 
हो फाग आग युगनद्ध होली


~ गिरिजेश राव

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

...फाग आग आँच

.. फाग आग आँच
नरम हुई कड़ियाँ
- फिर टूटीं।

पसर गया प्रेम
शब्द शब्द आखर आखर।
... तूने क्या, कैसे, क्यों बाँध रखा था ?