सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली
आ रही होली।
पुरा' बसन उतार दी
फुनगियाँ उगने लगीं
शोख हो गई, न भोली
धरा गा रही होली।
रस भरे अँग अंग अंगना
हरसाय सहला पवन सजना
भर भर उछाह उठन ओढ़ी
सजी धानी छींट चोली।
शहर गाँव चौरा' तिराहे
लोग बेशरम बाग बउराए
साजते लकड़ी की डोली
हो फाग आग युगनद्ध होली।
~ गिरिजेश राव