आज आप की ग़जल गुनगुनाई है।
लगता है जैसे हमारी बन आई है।
सुर ढूढ़ता रहा जिस्म-ए-साज में
आज जाना ये शै आलमें समाई है।
मतला, वजन, धुन,काफिये, बहर
मेहरबाँ, अनाड़ी ने महफिल सजाई है।
मिलेंगे उनसे आँख मिला कर पूछेंगे
हो इनायत, आज नीयत डगमगाई है।
चुप होंगें वे, हँसेंगे आँखों आँखों में
हुआ गजब,काफिर ने दिखाई ढिंठाई है।
सजाओ बन्दनवार गद्दी सँवारो पुकारो
बहक लहकी फिर,हर बात जो भुलाई है।
