गुरुवार, 1 मई 2014

अधिकार

बनाये नहीं जाते
दिये नहीं जाते
लिये नहीं जाते
कुछ अधिकार

बस होते हैं
होते हैं कि
उनके होने से
सब होते हैं
बनाने वाले
देने वाले
लेने वाले

वे ऐसे जुड़ते हैं
क्षिति - भोजन
जल - प्यास
पावक - पेट
गगन -  एकांत
समीर - साँस

करते व्यापार
छीनना चाहते हो
वे अधिकार

कैसे छीनोगे उन्हें?
जो
बनाये नहीं गये
दिये नहीं गये
लिये नहीं गये

वे थे, हैं, रहेंगे
कि तुम्हारा होना भी
उनसे ही है
खुद को खुद से
छीन कर तो देखो
मिटा कर तो देखो

दबंगई गिरहकटी
कुछ मामलों में नहीं चलते
जैसे:
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर
भोजन, प्यास, पेट, एकांत, साँस

रविवार, 30 मार्च 2014

हँसी

तुम्हारी हँसी -

तुलसी बिरवे बीच
फूली  

सरसो अकेली 

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

पुन:

(1)  
और जब मैं अन्धा हो जाऊँ
तब तुम मुझे स्पर्श देना
वह मेरा प्रकाश होगा।

(2)   
चश्मिस! 
जहाँ भी हो, सुनो! 
किशोर भोरों में जो 
टप टप टपकता 
ऊषा का आह्वान करता
अभिशप्त विश्वामित्र
देख लेता था तुम्हें 
तम के पार भी; 
आज जान गया है प्रकाश को 
अन्धा होने के बाद, 
उसका चश्मा उतर गया है।

(3)
कहो कि जब वही प्रकाशवही पुतलियाँवही आकाश होगा 
कहो कि जब उनके संघनन का रेटिना से नहीं साथ होगा 
तुम उतरोगी हर साँझ उस उदास दिये सी मेरी आँखों में 
जिसकी कालिख है जमा घर के इंतजारी ताखों में!

(4)
अन्धेरों ने कहा है हाथ बढ़ाने को 
रोशनदानी हवा बही है पाँव उठाने को 
मौन है कि कानों के लिये कुछ भी नहीं
छील गयी है याद खाल जलती भी नहीं 
बस नथुने हैं कि काम जारी है 
स्वेद वही भूमा की गन्ध वही
सूखे फागुन बस धूल भरी आँधी है।

(5)
अबीर लिये बैठा हूँ मैं 
तुम सेनुर थोड़ी ले आना।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

फूट पड़ो



अपनी बातों से
कुरेदता हूँ
कि तुम उठो!
नहीं,
फूट पड़ो
भँड़सार की जलती रेत से
उछलते मकई के दाने की तरह!
मुझे तुम्हें शुभ्र तप्त होते देखना है
जैसे कि पीताभ
मार्तण्ड होता है।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

टँगी

टँगी है ठिठुरन
वसंत में भीगती
पत्ती के सूखे गात से - 
उतार लूँ 
ओढ़ सकूँ 
तो कविता बने!