जो दूसरों की हैं, कवितायें हैं। जो मेरी हैं, -वितायें हैं, '-' रिक्ति में 'स' लगे, 'क' लगे, कुछ और लगे या रिक्त ही रहे; चिन्ता नहीं। ... प्रवाह को शब्द भर दे देता हूँ।
रविवार, 7 अप्रैल 2013
सोमवार, 1 अप्रैल 2013
उमसते प्रात में साँवरी
प्रातकी सूख गई,
केश तुम्हारे हुये गीले
नयनों ने चित्र टाँके,
फूल छिटके नील पीले।
अधर लाली खुल गई,
श्वेत बेला झाँकती
गन्ध मधुरा साँस दहका
निकटता राँधती।
साँवरे कपोल मस्तक,
ओस फूटे स्वेदकूप
रक्त चन्दन ऊष्ण उमगे
रूपसी रूप रूप।
थम गयी कामना,
निहारती आराधना
देह भीगे ग्रीष्म सी,
शीत सम सम्भावना।
केश तुम्हारे हुये गीले
नयनों ने चित्र टाँके,
फूल छिटके नील पीले।
अधर लाली खुल गई,
श्वेत बेला झाँकती
गन्ध मधुरा साँस दहका
निकटता राँधती।
साँवरे कपोल मस्तक,
ओस फूटे स्वेदकूप
रक्त चन्दन ऊष्ण उमगे
रूपसी रूप रूप।
थम गयी कामना,
निहारती आराधना
देह भीगे ग्रीष्म सी,
शीत सम सम्भावना।
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शुक्रवार, 15 मार्च 2013
वक़्त वक़्त की बात
वक़्त वक़्त की बात
कहीं से उठता है धुँआ
यूँ ही ढाँढ़स देने को
जला दी गयी घुन खाई लकड़ियों से।
अन्नपूर्णा के खाली भंडार
बरतनों में बजते हैं
भूख बुझती नहीं
पानी पेट मरोड़ता है।
बुझती है आँसुओं से आग
पेट की,मन की -
कवि रचता है
बड़वाग्नि उपमा उपमान।
कहीं से उठता है धुँआ
यूँ ही ढाँढ़स देने को
जला दी गयी घुन खाई लकड़ियों से।
अन्नपूर्णा के खाली भंडार
बरतनों में बजते हैं
भूख बुझती नहीं
पानी पेट मरोड़ता है।
बुझती है आँसुओं से आग
पेट की,मन की -
कवि रचता है
बड़वाग्नि उपमा उपमान।
रविवार, 10 मार्च 2013
खेलें मसाने में होरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी
खेलें मसाने में होरी, दिगम्बर खेलें मसाने
में होरी
भूत पिशाच बटोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी।
लखि सुन्दर फागुनी छटा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता भस्म भर झोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में
होरी।
गोप न गोपी श्याम न राधा
ना कोई रोक ना कवनो बाधा
अरे ना साजन ना गोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी
नाचत गावत डमरूधारी
छोड़े सर्प गरल पिचकारी
पीटें प्रेत थपोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी।
भूतनाथ की मंगल होरी
देखि सिहायें बिरज की छोरी
धन धन नाथ अघोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी।
रविवार, 3 मार्च 2013
नींद और देह
निंदिया लपक लड़ी!
पलकें झपक परीं
डालियाँ लचक परीं।
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