रविवार, 11 नवंबर 2012

बै मरदवा!

मैं सुन्दर हूँ
किसी का बेटा हूँ।
मैं अमर हूँ
अमृतमना से जुड़ा हूँ।

बोझ खिसकाने को
थोड़ा हाथ लगाने को
मुझे पहचान लेती हैं
अनचिन्ही आँखें -
मैं विश्वस्त हूँ,
मैं समर्थ हूँ।

उन्हें जब होती है
ज़रा सी भारी परेशानी
मुस्कुराती हैं ज़रा सी
परखते हुये मेरी पेशानी -
मैं मूर्त सहयोग हूँ
मैं समस्या का हल हूँ।

.
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ऐसा बहुत कुछ लिखता
अगर मेरा मित्र न कहता
'बै मरदवा!
ईहो कहे वाली बाति हे?'

लज्जित हूँ अपनी खिसक पर कि
अब भी हैं यूँ ही सब कुछ अध्यानी ही करने वाले।
कन्धे उचका कर पल में भूलने वाले
अब भी हैं कहने वाले -
बै मरदवा!

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

नइहरवा हम का न भावे

प्रियतम का पुर, उसके आने की आहट, उससे मिलने की बेचैनी और मिलन का आह्लाद निर्गुण और सगुण संत कवियों के प्रिय विषय रहे हैं। चाहे मीरा का 'सखी मोरी नींद नसानी' हो या 'कोइ कहियो रे प्रभु आवन की', कबीर का 'दुलहिनि गावहु मंगलाचार, हमरे घर आये राजा राम भर्तार' हो या 'नइहरवा हमका न भावे'; अनुभूतियों की गहन पवित्रता साधक, पाठक, गायक और स्रोता सबको दूसरे ही लोक में ले जाती है।
भोजपुरी क्षेत्र के कबीर का 'नइहरवा...' पछाँही और मालवी स्पर्श के कारण अनूठा है।
सुनिये इसे तीन स्वरों में - कुमार गन्धर्व, कैलाश खेर और नवोदित आदित्य राव। कुमार गन्धर्व से प्रेरणा पाते हैं कैलाश खेर और उनके स्वरों को ही आदित्य राव ने दुहराया है।    
नइहरवा हम का न भावे, न भावे रे । साई कि नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोई जाए ना आवे ।
चाँद सुरज जहाँ, पवन न पानी, कौ संदेस पहुँचावै ।
दरद यह साई को सुनावै … नइहरवा।
आगे चालौ पंथ नहीं सूझे, पीछे दोष लगावै ।
केहि बिधि ससुरे जाऊँ मोरी सजनी, बिरहा जोर जरावे ।
विषै रस नाच नचावे … नइहरवा।
बिन सतगुरु अपनों नहिं कोई, जो यह राह बतावे ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपने में प्रीतम आवे ।
तपन यह जिया की बुझावे … नइहरवा।

कुमार गन्धर्व
कैलाश खेर
आदित्य राव

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

गिनती


पर्व आया, चला गया
बच्चे आये, चले गये
हरसिंगार रह गया बाकी।
दुआर पर दो वृद्ध अकेले,
फिर से गिनने लगे हैं -
टूटती साँसें, पूजा के फूल।

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

तिक्की

पढ़ पाओगे मुझको अधूरा हूँ मैं? 
धैर्य तुममें नहीं जल्दी मुझको नहीं।

अपनी बातों के आगे हूँ चुप मैं बहुत 
चैन उनमें नहीं शब्द मुझमें नहीं।

तुम्हारी मुहब्बत सजदा हमारा
बस इबादत कहीं खुदाई कहीं।

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

देती है


धड़कनों में जान सुनाई देती है 
आहट-ए-रैहान * सुनाई देती है। 

मत बढ़ो आगे अब गलबहियों से
हुस्न सजी दुकान दिखाई देती है।

जुटने लगे कत्ल के सामान सब 
लबों पर मुस्कान दिखाई देती है।

आजिजी आमद किनारे खुदकुशी
मौत कुछ परेशान दिखाई देती है। 

बढ़ गये हैं शहर में काफिर बहुत
हर तरफ अजान सुनाई देती है।
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*रैहान - स्वर्ग की सुगन्ध