रविवार, 8 नवंबर 2009

लगे रहो

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यह कविता इस प्रयास को समर्पित

लगे रहो।
जब सब कुछ हो विरुद्ध व्यर्थ 
हो रहे हों अनर्थ।  
अबूझ को सूझ और
देने को कुछ अर्थ। 
लगे रहो।  

गरजता घनघोर 
समन्दर बेइमान। 
हों भले मन्द स्वर 
या सजे गिलहरी का मौन  
पुल निर्माण को  
लगे रहो। 

रेत में कदम
बहक चलें या सहम। 
बने कैसे पत्थर लीक 
तुम न पाए सीख। 
धुल जाएँगे अक्षर
किंतु अपने पढ़ान का
करते लिखान 
लगे रहो।  

शापित हैं हम। 
क्या हुआ जो जुड़े न लख कदम।
दो दो के गुणान को
पहाड़े की शान को 
चढ़ते रहो
लगे रहो।

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

अरमान

हमने जो पूछा उनका हाल 
देखा किए वे कहर का सामान
गुम थे सुम थे
लौट आए हम।
..फिर सुलगते रह गए अरमान।


मंगलवार, 3 नवंबर 2009

...होनी चाहिए


तुम आओ, न आओ घर हमारे - हम तो हर पल अगोरेंगे                  
बची तुम्हारे जेहन में, हमारी यादों की सौगात होनी चाहिए।


न आई तुम, पूछा किए भोर से, उषा से, चमकते आफताब से
शाम रुसवा हुई, खत से जाना कि मिलन की रात होनी चाहिए।


धौकनी बन गई साँसें, आँच निकले है जैसे गरम रोटी से
बुझा चूल्हा, कहीं किनारे अँसुअन भरी परात होनी चाहिए।  


बाहर मची है अन्धेरगर्दी, न कोसो आइने से मुखातिब हो
पहले गली में, नुक्कड़ पर, निकलने की औकात होनी चाहिए।


देखा है सुना है, मचल जाते हैं तुम्हारे असआर बाहर आने को
हवा में उछालने से पहले, जुमले की मालूमात होनी चाहिए।


वजह जगह भले अलहदा, सड़क पर हो राशन की लाइन में हो
कहीं भी कैसे भी हो, जरूरी है मेरे दोस्त, बात होनी चाहिए।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

अड़बड़िया कड़बड़

गहन चलो
काला पहन चलो
मन चलो
  उजले कफन चलो।





धंसती है लीक 
बहके कदम चलो 
रस्ते पे वे
पटरी सहम चलो
हँसते हैं गाल
आँखों बहम चलो।


ऊँची उनकी नाक 
रस्ते नमन चलो
पूछे हैं वो
हाले कहन चलो
करनी है बात
जीभे कटन चलो
ना सुनें जो वो
चुपके निकल चलो।


दूरी है क्या 
पाथे बिखर चलो
देखे हैं वे
अन्धे !ठहर चलो
न तलवे जमीन
चप्पल पहन चलो।


गोल गोल दिखते 
नज़रें उठन चलो
सिकोड़ी जो नाक
नजरें झुकन चलो
पापी दिमाग
कोंचे बहम चलो।

adbadiya
शरम का बहम
दिखता अहम चलो
काला पहन चलो
मनचलों !

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

पुरानी डायरी से - 6 : क्या गाऊँ मैं गीत


5 अप्रैल 1993, समय: सन्ध्या 06:45                                                                क्या गाऊँ मैं गीत

मेरे मन के मीत
क्या गाऊँ मैं गीत।


धुएँ में जीता श्मशान
चलती लाशें लोग।
कागज के इन फूलों में
उलझी सारी प्रीत।
क्या गाऊँ मैं गीत ?


उजली रात-तिमिर विहान
अन्धा जीवन भोग !
कितना सुख है शूलों में,
दु:खी बुद्ध हैं भीत।
क्या गाऊँ मैं गीत?


मेरे मन के मीत।