बुधवार, 4 जनवरी 2017

अटकन चटकन



तुम्हें बचाने को।
आखेटकों को शाक्य सिंह बनाने को।

 
मैंने
इस पृष्ठ पर कविता रची है
अगले पर एक नारा
उससे आगे एक नाटक
उसके पीछे एक ढपली।
देखो न!
क्रान्ति होने को है।
आँखें नहीं खुल रहीं?

द्रव पात्र में एक कैपशूल कम डालना था न
अलुमिनियम पट्टी से दो कस कम सूँघने थे
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दूर हटो सूअर कहीं के
सारे मर्द भेंड़िये होते हैं
मल भरे मन वाले।
 
होते कौन हो तुम मेरा चषक
मेरी पन्नी सूँघने वाले?
•••
क्रान्ति तब मानी जायेगी
जब ऐसे में भी मुझे कोई न छुये।

छूना मत मुझे नीच!
यू मेल सुविनिस्ट!

बस घर पहुँचा दो
पाँव जमीं पर नहीं मेरे
देखो मुझे उड़ते हुये।

जलो कि मैं आजाद हूँ -
घर तक छोड़ दो मुझे रास्कल,
इतनी भी सभ्यता बची है या नहीं?
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है कालिदास के रघुवंश में
वह कठोर राज, दण्ड आदर्श।
 
आभूषणों से लदी मदमत्त स्त्री अकेली
वारांगना
रात भर खुले में पड़ी रही
किसी ने कुछ न चुराया
न लूटा।
 
बन्द करो अपनी नोटबुक
जाओ! ले आओ 
कालिदास सा कवि
दिलीप सा शासक,
तब तक मुझे पीने दो।

घर स्थगित है।
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(दिलीप के राज्यानुशासन की महिमा बताते सुनन्दा वह कहती है जो आज कल के उन्नत समाज के लिये आदर्श कहा जा सकता है।
उनका शासन ऐसा था कि स्वच्छंद यौन स्वभाव वाली स्त्री भी यदि रात भर विहार के पश्चात बेसुध बीच मार्ग पर श्रांत पड़ी हो तो चोर या पतित तो हाथ लगाने से रहे, उसके वस्त्रों को वायु तक नहीं हिला सकती थी!
यस्मिन्महीम् शासति वाणिनीनाम् निद्राम् विहारार्धपथे गतानाम्।
वातोऽपि नास्रंसयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम्॥)
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'उत्कृष्ट सौन्दर्यबोध' और 'मातृपक्ष के प्रति अगाध सम्मान' - इन दो की साधना जब तक 'स्त्री पुरुष दोनों' नहीं करेंगे, जब तक उन्हें अस्तित्त्व का अनिवार्य भाग जैसा नहीं कर दिया जायेगा, तब तक स्थिति सुधरने से रही।
छोड़िये, मैं भी क्या ले कर बैठ गया! ये पढ़िये, सुनिये और देखिये:
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सीढ़ियों पर चढ़ती और उतरती मानव देह के सौन्दर्य के तीन दृश्य:
(1) कालिदास: रघुवंश:
काकुत्स्थ कुमार अज स्वयंवर आयोजन में स्थान ग्रहण करने जा रहे हैं। ऐसे समय में पुरुष सौन्दर्य का संभवत: यह इकलौता वर्णन हो।
वैदर्भनिर्दिष्टमसौ कुमारः कॢप्तेन सोपानपथेन मञ्चम्|
शिलाविभङ्गैर्मृगराजशावस्तुङ्गम् नगोत्सङ्गमिवारुरोह॥
(ऊँचे मंच पर पहुँचने के लिये सीढ़ियों पर चढ़ते कुमार अज ऐसे लग रहे हैं जैसे कोई सिंह शावक पर्वत शिखर पर पहुँचने के लिये तराशे पत्थर के सोपान चढ़ रहा हो।)


(2) दानिश:
 सुन्दर कोमलांगी दुल्हन विवाह हेतु सजने के पश्चात छत से नीचे उतर रही है।

बाम से उतरती है जब हसीन दोशीज़ा
जिस्म की नज़ाक़त को सीढ़ियाँ समझती हैं।

हुसैन बन्धुओं ने इस ग़जल को गा कर अमर कर दिया।
https://www.youtube.com/watch?v=o7eNtz4INL0

  
(3) टाइटेनिक में सीढ़ी चढ़ती रोज का स्वागत डॉसन करता है - "I saw that on A Nickelodeon and I always wanted to try it." 


सोमवार, 21 नवंबर 2016

अकथ कहानी देह की

देह की।
अकथ कहानी
नेह की॥
तप्त श्वास 
भुजवलय
तुम
शनैश्चर
हम
मन्द लय
शीत हास।
जीवन एक
लग गई ढइया!
ज्योतिष रीत गया।
सीवन एक
रह गई अंगिया
गोचर बीत गया॥
देह की।
अकथ कहानी
नेह की॥

शनिवार, 19 नवंबर 2016

सरेह में

हुआँ हुआँ मची है सरेह में,
कोई फसल कटी है सरेह में।

खुश किसान सभी खलिहान खुश,
सियारों की लगी है सरेह में।

फँसे मीन घिरा पानी खूब,    
नई मेंड़ें बँधी हैं सरेह में।

ताले लटक गये गोदाम में,
अब चाभियाँ लगी हैं सरेह में।

घन घमण्ड बड़े बरजोर घिरे,  
जो अर्थियाँ सजी हैं सरेह में।

सय्याद ले भागा अजाब सब,
पकड़ो पकड़ो मची है सरेह में। 

नहीं गोपी कोई गेह में,  
इक बाँसुरी बजी है सरेह में।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

माँ अमर नहीं करती

माँ अमर नहीं करती
जन्म दे बड़ा कर देती है।

पहली बार जिस दिन
माँगता है क्षमा पिता
संतति से किसी भूल की
टपकता है उसकी आँख से
अमृत
और बढ़ जाती है
आयु
कुछ सदियाँ और
मनुज की भूमि पर।

करते हैं पिता अमर
होते हैं कई गुना बड़े
उनके सम्वत्सर।

वे भूल करते हैं,
माँ कभी नहीं करती। 

प्रेम करोगी?

प्रेम अंततः टूटना है आँजुरी भर पाँखुरी, भींचना है, कि रोयें, टूटे पुहुप, सुबुक और जग सुगंधित हो। कहो! प्रेम करोगी? (होना, प्रेम नहीं, बस आपा खोना है)